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Sunday, May 24, 2009

डीएमके की राजनीति

सुरेश जायसवाल
मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस की नयी सरकार जब सत्ता संभालने की तैयारी कर रही थी तभी डीएमके ने कर दिया रंग में भंग । एक तरफ जहां सोनिया गांधी मनमोहन सिंह के साथ राष्ट्रपति भवन में शपथ लेने वाले मंत्रियों की सूची तैयार कर रही थीं वहीं डीएमके प्रमुख करुणानिधि ज्यादा मंत्रिपद की चाह में कोपभवन में जाकर बैठ गए । अब कांग्रेस आलाकमान के सामने समस्या ये कि वो अपने इस पुराने सहयोगी को समझाए कैसे । डीएमके को मनाने की कई कोशिशें की गयीं लेकिन वो टस से मस नहीं हुए । और आखिरकार नई सरकार को बिना डीएमके के मंत्रियों के ही शपथ लेनी पड़ी ।
कुल मिलाकर यूपीए सरकार की शुरुआत ही नहीं ठीक रही । वैसे शुरुआत तो कांग्रेस की पिछली सरकार की भी ठीक नहीं थी लेकिन उसने पांच साल कार्यकाल पूरा किया था । पांच साल पहले भी सरकार बनते समय डीएमके ने मंत्रिपद को लेकर ड्रामा किया था । दरअसल डीएमके की इस बार की सत्ता की नौटंकी के पीछे का कारण पारिवारिक है । डीएमके प्रमुख करुणानिधि अपने परिवार के मोह में अंधे हो गए हैं । करुणानिधि के सामने समस्या ये है कि वो अपने बेटे अझागिरी , बेटी कनीमोझी नाती दयानिधि मारन तीनों के लिए ही पद चाहते हैं । यहीं नहीं पार्टी के समीकरण को दुरुस्त रखने के लिए टी आर बालू और ए राजा को भी सत्ता की मलाई दिलाना चाहते हैं । करुणानिधि का यही परिवार मोह उन्हें मुसीबत में डाले हुए हैं ।
अब ये कहां की राजनीति है कि एक ही परिवार के तीन तीन सदस्यों को मंत्री के पद से नवाजा जाए । लेकिन यही तो क्षेत्रीय दलों की राजनीति है । अपने समर्थन के बदले में हर प्रकार की शर्ते मनवा लेना इन क्षेत्रीय दलों की पुरानी आदत रही है । समर्थन के बदले में राज्य के हितों के लिए कुछ शर्तें मनवा लेना तो जायज कहा जा सकता है लेकिन पूरे परिवार को सत्ता में हिस्सेदारी दिलवाना केवल ब्लैकमेलिंग ही कहा जाएगा । वैसे करुणानिधि का परिवारवाद केवल यहीं खत्म नहीं होता है । राज्य की राजनीति में भी करुणानिधि के परिवार का ही बोलबाला है । करुणानिधि के बेटे स्टालिन राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी के वारिस हैं । कुल मिलाकर करुणानिधि पूरे परिवार को ही सत्ता दिला देना चाहते हैं । लेकिन कांग्रेस भी डीएमके के इस दबाब में नहीं आना चाहती है । कांग्रेस को डीएमके के परिवार से तो समस्या नहीं है लेकिन उसे असली दिक्कत बालू और राजाके नाम को लेकर है । राजा और बालू दोनों ही पिछली सरकार में मंत्री थे । कांग्रेस आलाकमान दोनों ही मंत्रियों की कारगुजारी से वाकिफ है । राजा और बालू दोनों के ही दामन पर भ्रष्टाचार के दाग हैं । कांग्रेस आलाकमान और खासतौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बार अपने मंत्रिमंडल में किसी भी प्रकार का दाग नहीं देखना चाहते हैं । यही वजह है कि कांग्रेस दोनों के नाम पर आनाकानी कर रही है । लेकिन गठबंधन की राजनीति की मजबूरियां आखिरकार कांग्रेस को इन दोनों को मंत्रिमंडल में शामिल करने पर मजबूर कर देगी । अब देखना है कि डीएमके कब तक कांग्रेस के साथ ये ब्लैकमेलिंग का खेल खेलती रहेगी ।

Sunday, May 17, 2009

मेरा सुंदर सपना टूट गया

सुरेश जायसवाल
लोकसभा चुनावों के नतीजोंने कांग्रेस की तो बल्ले बल्ले कर दी लेकिन कितनों के तो सपने ही तोड़ दिए। चुनाव नतीजों से पहले बहुत से लोगों ने तरह तरह के सपने संजोकर रखे थे लेकिन इन कमबख्त नतीजों ने सारे सपनों पर पानी फेर दिया । नतीजों ने कितनों के सपनों को तो ऐसा तोड़ा कि वो कहीं के नहीं रहें लेकिन कुछ तो फिर से कुर्ता झाड़ कर खडे हो गए हैं ।

टूटे सपनों की इस कड़ी में बात करते हैं सबसे पहले लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी की । चुनाव नतीजों ने सबसे बड़ा झटका किसी को दिया है तो वो हैं पीएम इन वेटिंग आडवाणी । आडवाणी की किस्मत में शायद राजयोग लिखा ही नहीं था , अब उनको शायद पीएम इन वेटिंग से ही संतोष करना पड़ेगा । वैसे तो आडवाणी ने जी बरसों से पीएम बनने का सपना संजो कर रखा था लेकिन कभी वाजपेयी ने तो कभी पार्टी की अंतरकलह से उनके सपनों को साकार नहीं होने दिया और आखिरकार आडवाणी जी पीएम की कुर्सी का वेट करते ही रह गए । आडवाणी की उम्र और मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए तो ऐसा ही लगता है कि अब आने वाले समय में उनका ये सपना पूरा होने से रहा । अब आडवाणी जी अगर अगले लोकसभा चुनावों के लिए तैयारी करें तो बात और है लेकिन ऐसा होना मुश्किल ही लग रहा है । ''मजबूत नेता'' आडवाणी जब तथाकथित ''कमजोर पीएम ''मनमोहन सिंह से मुकाबला नहीं कर सके तो अगले चुनावों में कांग्रेस के संभावित पीएम उम्मीदवार राहुल गांधी का क्या मुकाबला कर सकेंगे । खैर हम आडवाणी के सपने के टूटने पर केवल सहानुभूति ही व्यक्त कर सकते हैं ।

अब बात करते हैं कुछ और लोगों का जिनके सपने चुनाव नतीजों की आंधी में बह गए । सीपीएम महासचिव प्रकाश करात भी उन्हीं लोगों में शामिल हैं जो आज अपने सपने टूटने पर आंसू बहा रहे होंगे । करात ने भी चुनावों से पहले देखा था एक सपना , सपना तीसरे मोर्चे की सरकार का । लेकिन वाह री जनता जनार्दन कैसी बेरहमी से इस सपने को चकनाचूर कर दिया । लेफ्ट पहले तो अपना ही गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल नहीं बचा सका । बची खुची उम्मीदें जयललिता , माया और नायडू के खराब प्रदर्शन ने पूरी कर दी । खैर अब करात साहब का सपना तो पूरा नहीं हो सका लेकिन वो इससे निराश बिल्कुल नहीं है और अगले चुनाव में गैर कांग्रेस ,गैर बीजेपी सरकार की तैयारियों में लग गए हैं ।


अब बात मराठा सरदार शरद पवार के सपने की । शरद पवार वैसे तो इन नतीजों पर खुशी जाहिर कर रहे हैं लेकिन पवार साहब ये पब्लिक है सब जानती है । ये बात तो सबको पता है कि नतीजों ने आपका दिल ऐसा तोड़ा है कि आप अपने आंसू दिखा भी नहीं पा रहे हैं । पवार साहब ने खंडित जनादेश की हालत में पीएम बनने का सपना संजो रखा था । पवार साहब का एक पैर तो यूपीए में था लेकिन दूसरा पैर वो तीसरे मोर्चे के साथ जोड़े हुए थे । पवार ने अपनी तरफ से पीएम बनने की हर गोटी सेट कर रखी थी लेकिन ईवीएम मशीनें खुलीं तो सपने पर जैसे घडों पानी पड़ गया । पवार ने लेफ्ट से लेकर पटनायक तक , जया से लेकर माया तक और नीतीश से लेकर शिवसेना तक से पींगे बढ़ा रखीं था लेकिन सारी मेहनत पर नतीजों ने पानी फेर दिया ।

चुनाव नतीजों ने दो महिलाओं के सपने पर भी पानी फेर दिया । ये दो महिलाएं है मायावती और जयललिता । बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी सपना देखा था कि वो बड़ी संख्या में सीटें जीतकर लाएंगी और सत्ता की जोड़तोड़ के जरिए पीएम की कुर्सी हासिल कर लेंगी । लेकिन न तो माया का दलित समाज का नारा काम आया और न ही सर्वसमाज का । दलित पीएम बनने की उनकी हसरत अधूरी ही रह गयी । कुछ ऐसा ही सपना टूटा है अम्मा का । अम्मा यानी एआईएडीएमके नेता जयललिता । जयललिता को तो इस बार तमिलनाडु में क्लीन स्वीप की उम्मीद थी । हर कोई कह रहा था कि अम्मा तो इस बार डीएमके का सूपडा साफ कर देंगी । वैसे भी तमिलनाडु की जनता का ये तरीका रहा है कि वो एक बार एक पार्टी और अगली बार दूसरी पार्टी को सत्ता का स्वाद चखने का मौका देती हैं । लेकिन जनता ने ये भ्रम भी तोड़ दिया और दिल्ली की सत्ता की मलाई चखने का अम्मा का ख्वाब अधूरा ही रह गया ।

ये तो थे वो बड़े बड़े सपने जिन्हें जनता की मार ने तोड़ दिये , इसके अलावा छोटे मोटे सपने तो कितने ही टूट गए जिनकी कोई लिस्ट ही नहीं है । ये तो बातें थी नेताओं के सपने की । चुनावी नतीजों ने मीडिया के सपने को भी चकनाचूर कर दिया है । खासतौर पर टीवी चैनल के लोगों ने तो क्या क्या सपने सजा रखे थे । उम्मीद थी बहुमत तो किसी को मिलगा नहीं और फिर होगी जमकर जोड़तोड़ । इस जोड़तोड में टीवी चैनलों को भी अपनी दूकान चमकने का सपना था । लग रहा था कि करीब पखवाड़े तक तो ये गणित चलेगा ही कि कौन किधर जा रहा है , कौन किससे मिल रहा है ,किसकी सरकार बनेगी वगैरह वगैरह । लेकिन नतीजों ने इसका मौका ही नहीं दिया और दो घंटे के अंदर ही साफ हो गया कि मनमोहन की अगुवाई में यूपीए की ही सरकार बनने जा रही है । खैर सपने तो सपने ही होते है कुछ पूरे होते हैं तो कुछ अधूरे ही रह जाते हैं । हम तो बस ये ही कह सकते हैं कि भैया ये तो जनता है बड़े बड़ों के सपने में आग लगा देती है ।

Wednesday, May 13, 2009

देखो मैंने देखा है इक सपना...

सुरेश जायसवाल

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव का आखिरी समर पूरा होते ही 7 रेसकोर्स रोड पर कब्जे की जंग तेज हो गयी है । हर छोटा बड़ा राजनीतिक दल और मोर्चा सत्ता की रेस में शामिल हो गया है । इस रेस में शामिल दलों और मोर्चों की न तो कई विचारधारा है और न ही कोई राजनीतिक मूल्य । रेस में शामिल हर दल और मोर्चा या तो सत्ता हासिल करने की फिराक में है या फिर है मंत्री की कुर्सी पर नजर । और तो और इस रेस में इस बार बार लेफ्ट फ्रंट भी शामिल है । कथित तौर पर विचारधारा की लड़ाई के लंबरदार लेफ्ट के महासचिव प्रकाश करात भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजरें गडाए हुए हैं । तभी तो उन्हें ये कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि मौका पड़ने वो भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं

वैसे तीसरे मोर्चे की सरकार का सपना तो करात ने काफी पहले से ही देखना शुरु कर दिया था । इसी सपने को पूरा करने के लिए ही करात ने परमाणु करार के मसले पर यूपीए की सरकार से समर्थन वापस लिया । इसके बाद से करात ने कुर्सी हासिल करने का ताना बाना बुनना शुरु कर दिया । करात के इस सपने का आधार है तीसरा मोर्चा । गैर कांग्रेस और गैर बीजेपी की सरकारों के विकल्प के तौर पर करात ने ये तीसरा मोर्चा खडा किया है । करात को उम्मीद है कि ये मोर्चा ही उनको सात रेसकोर्स की गद्दी तक पहुंचा देगा और वो ऐसा काम कर दिखाएंगे जो लेफ्ट के चाणक्य रहे ज्योति बसु भी नहीं कर सके । वैसे करात का ये सपना कितनी हकीकत है और कितना फसाना ये तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा ।

वैसे आइये हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर करात के सपने में है कितना दम । करात के तीसरे मोर्चे में चार लेफ्ट पार्टियों के अलावा मायावती की बीएसपी , एआईएडीएमके की जयललिता ,पीएमके के रामदौस , एमडीएमके के वाइको , तेलगूदेशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू , टीआरएस के चंद्रशेखर राव और बीजेडी के नवीन पटनायक शामिल हैं । करात को उम्मीद है कि उनके साथ पवार जैसे कई और लोग भी शामिल होंगे । करात को उम्मीद है कि तमिलनाडु में जयललिता का गठबंधन स्वीप करेगा तो आंध्र में नायडू को मिलेंगी काफी सीटें । इसके अलावा यूपी में मायावती के हाथी से करात को काफी उम्मीदें है । करात को लगता है कि तीनो मिलाकर 70-80 सीटें हासिल कर लेगें । करात का गणित है कि लेफ्ट , बीजेडी और बाकी दलों को मिलाकर मोर्चा 150 से 160 सीटें हासिल कर लेगा । इसके आगे की करात की गणित कांग्रेस के समर्थन पर टिकी है । लेफ्ट बार बार ये कह रहा है कि वो इस बार कांग्रेस को समर्थन देगा नहीं बल्कि कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष सरकार के लिए समर्थन देना होगा । लेकिन करात साहब ये भूल जाते हैं कि जिस कांग्रेस से उन्होंने छह महीने पहले ही समर्थन वापस लिया है वो उन्हें समर्थन क्यों देगी । फिर भी करात को लगता है कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के नाम पर कांग्रेस से समर्थन मिल जाएगा ।

उधर कांग्रेस भी किसी से कम नहीं है । कांग्रेस ने तो पहले से ही ये राग अलापना शुरु कर दिया है कि अगर सांप्रदायिक तत्वों तो सत्ता से दूर रखना है कि सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को यूपीए को समर्थन करना होगा । अब सवाल ये है कि दोनों में से कौन है जो एनडीए को सत्ता से बाहर रख सकता है । कांग्रेस बार बार ये कह रही है कि वो किसी को समर्थन देगी नहीं केवल समर्थन लेगी । अब करात बाबू ये सवाल तो उठा ही सकते हैं कि आखिर कांग्रेस हर बार दूसरों से समर्थन क्यों लेती है , कभी तो वो भी किसी दूसरे दल का समर्थन करे । मान लिया कि अगर कांग्रेस ने समर्थन दे भी दिया तो आखिर कितने दिनों तक । कांग्रेस का इतिहास तो यही बताता है कि वो सरकार बनाने में नहीं गिराने में भरोसा रखती है । खैर समर्थन लेने या देने की बात तो तब आएगी न तीसरा मोर्चा स्थिर रहेगा । तीसरे मोर्च में टूटफूट की शुरुआत हो चुकी है ,सबसे पहले टीआरएस करात की गोद से उठकर एनडीए के पाले में जा बैठा है । यहीं नहीं टीआरएस ने ये भी भरोसा दिलाया है कि वो कुछ और साथियों को भी एनडीए के पाले में लाएंगे । यानी रिजल्ट आए नहीं तीसरा मोर्चा बिखरना शुरु । वैसे करात ने जिन पार्टियों के बल पर तीसरे मोर्च की सरकार का सपना देखा है वो भी किसी विचारधारा से बंधे नहीं है बल्कि बिन पेंदी के लोटे हैं । करात को ये नहीं भूलना चाहिए तीसरे मोर्चे के उनके सहयोगी नायडू , माया , जयललिता , रामदौस , वाइको , देवगौड़ा और पटनायक कभी न कभी एनडीए के साथ रहें हैं । इन सभी लोगों को मौका पड़ते ही एनडीए के पाले में जाने से रोकना करात के लिए खासा मुश्किल होगा । खासकर जया और माया तो केवल सौदेबाजी की मास्टर हैं , जहां ज्यादा हाथ में आया उधर ही हो लिए चाहे वो यूपीए हो या फिर एनडीए । तब फिर आपको सपने का क्या होगा करात साहब । वैसे करात साहब को ज्यादा दिन परेशान होने की जरुरत नहीं जैसे ही ईवीएम मशीनें खुलेंगी , सपने की हकीकत और फसाने का अंदाजा हो जाएगा ।

Monday, May 11, 2009

साथ रहा न जाय, दूरी सही न जाय

लोकतंत्र का ऐसा ड्रामा शायद ही भारत ने कभी इससे पहले देखा हो। दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र ने इससे ज्यादा शर्मनिरपेक्ष चुनाव इससे पहले नहीं देखा होगा। त्रिशंकु संसद का ऐसा अंदेशा और ऊपर से कुर्सी का ऐसा मोह की आखिरी चरण का चुनाव नजदीक आ गया लेकिन अभी तक ये पता नहीं चल पा रहा है कि कौन किसके खिलाफ लड़ रहा है। एक पल कोई किसी को गाली दे रहा है, दूसरे ही पल ये सोच कर उसे सराह रहा है कि कहीं कुर्सी के लिए उसकी जरूरत न पड़ जाय। सब एक दूसरे के दोस्त हैं। ऐसे दोस्त, जो वक्त आने पर दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं।
अगर यूपीए की ही बात करें तो सब एक दूसरे के खिलाफ हैं लेकिन सब एक दूसरे के साथ दोस्ती की दुहाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल यूपीए का एक अहम घटक दल है लेकिन कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहा है। कांग्रेस की आलोचना करके वोट मांग रहा है लेकिन लालू साथ ही ये भी कहते हैं कि हम यूपीए के साथ हैं और साथ सरकार बनाएंगे। राम विलास पासवान और मुलायम सिहं यादव लालू के साथ हैं। कांग्रेस और आरजेडी, लोकजनशक्ति पार्टी, समाजवादी पार्टी का गठबंधन एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं लेकिन सब फिर भी दोस्त हैं।
लेफ्ट चुनाव से पहले ही सरकार से कन्नी काट चुका है लेकिन सबसे बुरा हाल उसी का है। प्रकाश करात कहते हैं-कांग्रेस को समर्थन बिल्कुल नहीं। सीताराम येचुरी कहते हैं कि सारे विकल्प खुले हुए हैं। अब करात के सुर भी बदल गए हैं। प्रणव मुखर्जी ने कह दिया कि केंद्र में सरकार बनाने में लेफ्ट को 250 साल लग जाएंगे लेकिन फिर भी बुद्धदेव भट्टाचार्य के सुर नरम ही रहे। कहा-कांग्रेस हमारे लिए अछूत नहीं। दरअसल जन्नत की हकीकत सबको पता है। कांग्रेस की ओर से सफाई भी आ गई। पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि लोकल राजनीति की मजबूरी है ऐसी बयानबाजी। पश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और लेफ्ट एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और इसलिए दोनों एक दूसरे के खिलाफ ऐसे हमले करते रहे हैं। यानि राज्य के लिए एक राजनीति और केंद्र की कुर्सी के लिए दूसरी राजनीति। पहले कम से कम सरेआम इस सच्चाई को नेता स्वीकार नहीं करते थे लेकिन अब जनता के प्रति जवाबदेही की कोई भावना नहीं रह गई है, इसलिए पूरी निर्लज्जता के साथ इसे स्वीकार किया जा रहा है। जिस वोटर से लेफ्ट की आलोचना करके आप वोट मांग रहे हैं, वो अगर बाद में ये सवाल करे कि कुर्सी के लिए उसी लेफ्ट के गले क्यों लग लिए तो क्या जवाब देंगे सिंघवी साहब आप? आखिर बीजेपी की सांप्रदायिकता के हौवा का बहाना कब तक बनाते रहेंगे? पब्लिक इतनी बेवकूफ भी नहीं। दरअसल लगातार पतनोन्मुख भारतीय राजनीति के दोहरेपन का इससे शर्मनाक उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता।
समाजवादी पार्टी की बात करें तो उसकी लड़ाई अपने आप से ही है। पूरे वोट की राजनीति अमर सिंह बनाम आजम खान के खिलाफ चल रही है। ऐसे में ये बीजेपी या बीएसपी का मुकाबला क्या खाक करेंगे? कोई मुद्दा नहीं। बस अमर सिंह आजम खान को गरियाए जा रहे हैं और आजम खान अमर सिंह पर हमला बोले जा रहे हैं।
ममता पहले बीजेपी की हमराह थी, अब कांग्रेस के साथ हैं लेकिन रह-रह कर जिस तरह कांग्रेस का लेफ्ट प्रेम उमड़ रहा है, उससे उन्हें अपने वोटरों के सामने अच्छी खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि ममता का पूरा अस्तित्व ही लेफ्ट के विरोध पर टिका हुआ है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हर कोई अपने पाले में लाना चाहता है। शायद लालू-पासवान को सबक सिखाने के लिए कांग्रेस नीतीश को पटाना चाहती है। राहुल नीतीश को तारीफ करते हैं और लालू-पासवान मन मसोस कर रह जाते हैं। हालात ऐसे कि चुप रहा भी नहीं जाता, कुछ कहा भी नहीं जाता। मोइली ने नीतीश पर वार किया तो कांग्रेस ने उनकी छुट्टी कर बता दी कि किसी भी विरोधी के खिलाफ कम से कम 16 मई तक कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन अब जब नीतीश पिघलते नहीं दिख रहे हैं तो कांग्रेस उनकी धर्मनिरपेक्ष पहचान पर सवाल उठा रही है। दाल गले तो आप अच्छे, नहीं गले तो आप गंदे।
दरअसल राजनीतिक दलों को जो बात नहीं समझ आ रही है और जो बात उन्हें जल्द समझ लेना चाहिए--वो ये है कि ये खंडित जनादेश कहीं न कहीं इस बात का संकेत जरूर है कि जनता का विश्वास उन पर से टूटा है। जनता का विश्वास जीतने की जगह वो खंडित जनादेश को सौदेबाजी की शक्ल देने में तूले हुए हैं और इस तरह वो अपनी विश्वसनीयता भी खोते जा रहे हैं। जनता में ये भाव तो पहले ही बैठ चुका है कि राजनीति में आदर्श और सिद्धान्त के लिए कोई जगह नहीं है। राजनीतिक दलों का अभी जो आचरण है, उससे जल्दी ही उन्हें ये भी भरोसा हो जायेगा कि ये विश्वास करने लायक नहीं है। जाहिर है हम एक खतरनाक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं।

Sunday, May 10, 2009

मां, चिंता की कोई बात नहीं

मदर्स डे पर ख़ास
सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव
मां!
तुम्हारा ख़त मिला
मैं जानता था
तुम चिंतित होगी
मेरे लिए
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
यहां सब ठीक है।

मेरी नौकरी
छूट गई है
कारखाने की चिमनी
अब धुआं नहीं
नारे उगल रही है
लेकिन चिंता की
कोई बात नहीं
मैं मज़दूरी कर रहा हूं
कमा रहा हूं, मस्त हूं।

आंदोलन
जोरों से चल रहा है
मज़दूर
रोज जोश में आते हैं
और
पुलिस के डंडे खाकर
ठंडे पड़ जाते हैं
लेकिन
तुम फिक्र मत करना
मैं दूर ही रहता हूं
इन झमेलों से।

मां !
अब यहां
फुटपाथ पर रहने के लिए भी
मार होती है
इसलिए
कई-कई रात
आंखों में ही गुजारनी पड़ती है
उन रातों को
बहुत याद आता है
तुम्हारा फटा आंचल
जिसमें छिपकर
निश्चिंत हो जाता था
मेरा बचपन
फिर भी
चिंता की कोई बात नहीं।

मां!
यहां की हवा में
तैर रहा है ज़हर
पानी पीने लायक नहीं रहा
अस्पतालों में
कतारों में खड़े मरीज़
इलाज से पहले ही
दम तोड़ रहे हैं
फिर भी
मैं ठीक हूं
चिंता की कोई
बात नहीं है।

वैसे सच तो यह है मां
कि
शहर
अब आदमी के रहने लायक नहीं रहा
सोचता हूं
गांव वापस लौट आऊं।

Sunday, April 19, 2009

जब इतने दिन ढोया है तो ढो ले और अंधेरा थोड़ा

नूर मुहम्मद नूर की ग़ज़ल
रोग भयंकर हो जाती है, धीरे-धीरे खांसी माई
यही भाग का लेखा अपना, काहें होत रुआंसी माई।

दाना एक नहीं है घर में, पेट जल रहे चूल्हे ठंडे
तू ही नहीं अकेली दुखिया, चारों ओर उदासी माई।

तन पथरीला दिन पथरीले सपने भी पथरीले निकले
दिन भर पत्थर तोड़-तोड़ कर टूटी भूखी प्यासी माई।

जब इतने दिन ढोया है तो ढो ले और अंधेरा थोड़ा
शायद कोई सूरज लाए नवका साल नवासी माई

बाबा के दम्मे की औषधि, तेरी आंखों का चश्मा भी
आऊंगा जल्दी ही लेकर, धर तू धीर जरा सी माई।

गिरवी खेत, मड़इया, बीखो, बाबा से कहना छूटेंगे नहीं
मैं अब बेकार हो गया, दफ्तर में चपरासी माई।

Friday, April 17, 2009

गाली बनते शब्द

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव
बड़े प्यार से मैंने उसे बुलाया था-अरे पप्पू, कैसे हो?
और वो भड़क गया. सुबह-सुबह खरी-खोटी सुना दी। ऐसी लताड़ लगाई कि शायद अब इस जन्म में तो मैं पप्पू शब्द अपने मुंह से निकालूंगा ही नहीं। जहां तक मैं जानता था और बरसों से जानता था कि उसका नाम पप्पू ही था। सभी उसे प्यार से पप्पू ही बुलाते थे और अपने इस नाम पर वो इतराता भी कम नहीं था। ये नाम पहले उसे अपने घर में सबसे प्यारा होने का एहसास दिलाता था लेकिन आज पप्पू कहते ही वो क्रोध से भर उठा और साफ शब्दों में आगाह कर दिया कि आगे से मैं उसे उसके ऑफिशियल नाम पंकज कहकर ही बुलाऊं।
बाद में पता चला कि पप्पू तो अब प्यार का नाम नहीं रहा बल्कि गाली बन गया है। पप्पू कांट डांस स्साला तक तो उसने बर्दाश्त कर ली थी। गुस्सा तब भी आया था कि पप्पू कांट डांस तक तो ठीक था, लेकिन अचानक ये रिश्ता जोड़ने की क्या जरूरत थी। फिर भी उसने इसे बर्दाश्त कर लिया था। तय किया था कि डांस सीख कर उन्हें करारा जवाब दे देगा, जो कहते हैं कि पप्पू कांट डांस...
लेकिन अब तो हद हो गई। नया नारा उछाल दिया-पप्पू कांट वोट... अब पप्पू का मतलब साफ-साफ बुद्धू और लापरवाह हो गया। अब इसे वो कैसे बर्दाश्त करता? पप्पू नाम से तौबा करना ही बेहतर समझा।
प्यार पप्पू शब्द गाली बन गया।
पप्पू का दर्द मेरी समझ में आ गया। अपने मन को तसल्ली दिया कि मेरे दर्द से उसका दर्द कितना ज्यादा है। कोई सरेआम किसी के नाम का ऐसा मजाक बना दे कि उसे अपना नाम तक बदलना पड़ जाय तो तकलीफ तो होती ही है.
फिर भी मन उदास हो गया। सुबह-सुबह की पप्पू सॉरी पंकज की फटकार से दुखी मन को लिए मैं पार्क की तरफ बढ़ गया.
शर्मा जी मिल गए। उन्हें देखकर मैं चौंक गया। इतने हठ्ठेकठ्ठे शर्मा जी इतने कृशकाय कैसे हो गए? पप्पू की बात भूल गया। दुआ सलाम के बाद पूछ बैठा--क्यों शर्मा जी, तबीयत तो खराब नहीं थी। बड़े कमजोर हो गए हैं?
कमजोर कहना था कि शर्मा से गुस्से से लाल हो गए। क्या कहा? कमजोर? मैंने आज तक किसी के सामने सिर नहीं झुकाया और अपनी मर्जी से अपने फैसले करता रहा और तुमने मुझे कमजोर कह दिया?
बाद में पता चला कि चुनावी जुबानी जंग में पार्टियों ने कमजोर शब्द को भी गाली बना दिया है। हर आदमी दूसरे कमजोर और खुद को मजबूत बनाने के लिए दलीलें देता फिर रहा है।
यानि अब आप किसी कमजोर को कमजोर भी नहीं कह सकते।
पप्पू को तो पप्पू कह ही नहीं सकते।
शब्द ऐसे ही गाली बन जाते हैं. सावधानी के साथ प्रयोग करना सीखना होगा।

Wednesday, April 15, 2009

वो जाने वाले हो सके तो...

सवा तीन महीने।
काफी लंबा वक्त होता है सवा तीन महीने। इतने वक्त में बहुत कुछ बदल जाता है।
इतने वक्त में सिर्फ किसी व्यक्ति ही नहीं बल्कि पूरे के पूरे देश की तकदीर बदल सकती है।
इस दौरान देश में चुनावी बिगुल बज गया।
पहले चरण का वोट भी कल पड़ना है।
जुबानी जंग का एक लंबा सिलसिला ऐसा चल निकला, जिसने बता दिया कि ये सवा तीन महीने पतन के गर्त में जाने के लिए कम नहीं होते। नेता कुर्सी के लिए कुछ भी बोल सकता है, कुछ भी कर सकता।
इन सवा तीन महीनों में बहुत कुछ बदल गया लेकिन नहीं बदला तो ब्लॉग के प्रति मेरा प्यार, मेरा लगाव और तड़प।
बार-बार खोल कर देख लेता, साथी क्या लिख रहे हैं?
इन सवा तीन महीनों में कई नए साथी आ गए अपने धारदार और विविध विचारों के साथ।
इस तड़प और प्यार ने फिर खींच लिया.
लौटना तो था ही। वक्त शायद ज्यादा लग गया।
जब ब्लॉग से दूर था तो बार-बार यही लग रहा था मानो वो पुकार रहा हो--वो जाने वाले हो सके तो लौट आना।
लौट आया दोस्त। क्षमा याचना सहित।
उम्मीद है कि पहले की तरह ही आपका स्नेह और प्यार मिलता रहेगा।

शुरुआत एक छोटी सी कविता से
बहुत दिनों बाद
हुई है बारिश
गीली हुई है
मन की माटी।
फूट रही हैं कविताएं।

Friday, January 2, 2009

संन्यास राग

वात्सल्य राय
साल नया है... तो जोश भी नया होना चाहिए... जिनका जोश ठंडा पड़ चुका है, उन्हें भी नई रवानी हासिल करने का मौका मिलना चाहिए... लेकिन ऐसी रियायत होती कहां है... जिन्हें संन्यास राग गाने की आदत है, उन्हें तारीख बीतने, कलैंडर बदलने या किसी बरस के जाने आने से क्या फर्क पड़ता है... वो तो हर मौसम में सिर्फ एक ही सुर में गाते हैं... उन्हें तो एक ही राग आता है... संन्यास राग।

याद होगा... इस राग ने अपने अटल जी को कितना आजिज कर दिया था... अच्छे- भले कामयाब दौरे से लौटे थे... प्रधानमंत्री के तौर पर कद भी ऊंचा हुआ था... लेकिन भाई लोग गाते रहे संन्यास राग... और अटल को कहना पड़ा " ना टायर्ड... ना रिटायर्ड... लेकिन आडवाणी जी के नेतृत्व में विजय के लिए प्रस्थान... "

संन्यास राग ने अपने कुंबले को भी खूब झिकाया... जब दिखें, भाई लोग पूछ बैठें... फैब फोर का क्या हो रहा है... कंधा कैसा है... भई ये वीआरएस क्या है...जंबो बार- बार कहते रहे... मैं खुद नहीं जानता फैब फोर क्या है... वीआरएस तो सुना ही नहीं... जब जाना होगा बता देंगे... लेकिन भाई लोग नहीं माने... कुंबले को जाना ही पड़ा... आखिर महानता के शिखर पर बैठा संत पुरूष कब तक कान बंद कर पाता
संन्यास राग बुश साहब ने भी सुना... ये बात दीगर थी कि उनका संन्यास पहले से तय था...महामहिम को भी पता था कि कब जाना है... लेकिन वो विदाई क्या जो संन्यास राग के बिना हो... तो मुंतजिर अल जैदी ने सुना दिया संन्यास राग... सरगम जूतों के जरिए बजी... गाने के बोल थे... " ये ले कुत्ते विदाई का चुंबन "

कुछ ऐसा ही संन्यास राग हेडन भी सुन रहे हैं... वही हेडन जो कभी हरभजन तो कभी ईशांत को रिंग में ललकारते थे... बल्ले पर बड़ा गुमान था... लेकिन ज़हीर ने वो वार किया कि रन निकलने ही बंद हो गए...और शुरू हो गया संन्यास राग... यकीन मानिए, जूते दिख भले ही नहीं रहे हैं लेकिन पड़ जरूर रहे हैं... मेलबर्न के पहले तक पोंटिंग हिमायत में थे... मेलबर्न में उनका गुरूर दक्षिण अफ्रीकी बूटों में क्या कुचला, पोंटिंग भी हेडन की सरपरस्ती से तौबा करने लगे...लेकिन हेडन कुंबले तो नहीं हैं... वो बुश भी नहीं हैं, जो जूतों को डक कर जुमला बना गए... " डक इट लाइक बुश "...... हेडन तो तब तक नहीं जाएंगे जब तक कि बूट की चोट सह रहा सिर ही बूटों में ना आ जाए... लेकिन शायद, क्रिकेट फैन्स ऐसा नहीं चाहते हैं... बेशक, हेडन ने खूब हेकड़ी दिखाई हो... भले ही वो सायमंड्स की तरफ से झूठी गवाही के गुनहगार रहे हों... भले ही उन्होंने मैदान में दिलेर साबित हो रहे दिल्ली के बच्चे ईशांत को बॉक्सिंग रिंग में ललकारा हो... लेकिन हमें वो हेडन भी याद है जिसने लारा को पीछे छोड़ा था... जिसका बल्ला दहाड़ता था... जो मैदान के बाहर बाइबल की छांव में नज़र आता है...लेकिन क्या माकूल विदाई की बांट जोहता हेडन भी वही हेडन है... अगर है तो फिर उसे संन्यास राग सुनाई क्यों नहीं दे रहा...

Monday, December 1, 2008

मत करो जज्बे को सलाम!

टेलीविजन पर बारूद की गंध नहीं आती लेकिन जेहन पर इसका जबर्दस्त असर है। टेलीविजन के पर्दे पर सिर्फ दिखता है धुआं, गुबार, आग। टेलीविजन के सामने बैठते दम घुटता है। बारूद का धुएं की गंध नाक से होते हुए सीधे दिमाग में उतर जाता है। आसपास कहीं धुआं नही, सिर्फ छोटे से एक पर्दे पर है गुबार लेकिन पूरे जेहन मानो वही गंध भरा हुआ है। जहां जाता हूं वही गंध।
ताज और ओबेराय होटल के फर्श पर बिखरे खून मानो मेरी आंखों में कई चढ़ आया है। हर ओर खून दिखता है, खौफ़ दिखता है। मुंबई आज पिर चल पड़ी है। उसी खौफ़ के साथ। पूरी मुंबई के चेहरे पर खौफ है। मन बहलाने के लिए कहने वाले कह रहे हैं--मुंबई का जज्बा। मुंबई के जज्बे को सलाम। लोग मन ही मन भन्नाते हैं। ताड़ पर मत चढ़ाओ। कोई जज्बा नहीं है। मजबूरी है। पेट के लिए घर से बाहर निकलना पड़ेगा। निकल रहे हैं। सुरक्षा चाहिए। पुख्ता इंतज़ाम ताकि आम आदमी भेंड़ बकरी की तरह न मारा जाय। सरकार सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम रहती है तो जज्बे को सलाम करती है।

दिल्ली डरा हुआ, अहमदाबाद डरा हुआ है। हर जगह के लिए एडवाइजरी आ रही है। सुरक्षा इंतजाम मजबूत किए जा रहे हैं लेकिन लोगों को भरोसा नहीं होता। चेतावनी के बाद सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का जुमला बड़ा आम हो गया है। इसलिए लोगों को भरोसा नहीं होता। दिल्ली तो वैसे भी रामभरोसे है। मुंबई पर आतंकी हमले के रोज काफी रात से दफ्तर से लौट पाया था। रास्ते में कहीं कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं दिखा था। यहां हादसे के बाद दिखती है सुरक्षा। उससे पहले और बाद में जज्बे को सलाम।