सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Sunday, August 16, 2009

कसूर


शैलेंद्र की एक कविता
उनका
कोई
कसूर
नहीं था

उन्हें कुछ भी नहीं
हथियाना था
कब्जियाना था
फिर भी
फिर भी
जंगल में आग लगी
और जल गए आशियाने
उनके भी

अपनी दुनिया में ही
खोए रहने की आदती थी उनकी

और उनकी
हर जगह खलल डालने की।


अपने ही देश में से साभार

Friday, August 7, 2009

अपना सवाल जवाब

गोपाल प्रसाद की एक कविता


जब यही अपराध है कि
चोर को चोर न कहूं
तो मैं सहर्ष यह अपराध करूंगा
धरूंगा हर उस जगह कदम
जहां धरना जरूरी है


आम को आम
और वाम को वाम
उस समय तक कहूंगा
जब तक मेरी जीभ मेरे पास है
कैसा समय आ गया है कि
प्रतिवाद बर्फ बन गया है

सुना नहीं आपने
पैसेंजर ट्रेन में घुस
कुछ गुंडे
सैकड़ों लोगों के बीच
एक मां से जवान बेटी छीन
सबकी आंखों के सामने
बलात्कार कर,
डिब्बे को लूट
साहस के साथ धन और धर्म लेकर
रफूचक्कर हो गए।
वहां सभी पत्थर नहीं थे
मगर टुकुर टुकुर सब कुछदेखते रहे
और सोचते रहे कि
कब आएगा स्टेशन

क्या गजब है
लोग मल्हार को भैरवी
सिद्ध करने में
एड़ी चोटी का पसीना
एक किए हुए हैं
राशन की दुकान से
सिर्फ इसलिए
लौट आते हैं कि
बनिया कह देता है-नहीं है
मगर उसी दुकान से
बोरा का बोरा
लोगों की आंखों के सामने से
पार हो जाता है
आप समझ रहे हैं न सारी स्थिति?

लोग सिर्फ देखते हैं
ऐसा नहीं करते कुछ
कि हो जाय
वारा न्यारा

साला, संसद में एक चूहा
घुस जाता है तो
कोहराम मच जाता है
लेकिन उसके भीतर
कितने सांप और भेड़िए हैं
उनके लिए कहां कुछ होता है
है न देशभक्ति
मजाक का दूसरा नाम?

उम्र भर चौराहे पर
खीरा बेचने वाला
खीरा ही बेचता रहा गरीब
उधर, धूर्तता का पासा फेंक
जीरा में इधर-उधर करने वाला
हीरा का व्यापारी बन गया

आप इसका राज समझ रहे हैं
इसी को मोहन दास करम चन्द गांधी ने
कहा था --अपना सुराज
जैसा कल था
वैसा ही है आज।

1965 में लिखी गई कविता
फूलों में दुपहरिया हो गया हूं से साभार

Wednesday, August 5, 2009

चौधरी हो तो दिखाओ चौधराहट

वात्सल्य राय
गिल साहब माफ कीजिएगा। भले ही आपका गिला जायज हो। भले ही तमाम खिलाड़ी आपके सुर में सुर मिला रहे हों लेकिन हमें तो बीसीसीआई की ठसक ही रास आ रही है। कोई माने या न माने हम तो अपने क्रिकेटर्स को ईमानदार ही मानते हैं। सचिन से सच्चा खिलाड़ी कौन हो सकता है। क्या सचिन की ईमानदारी वाडा के नियमों से बंधने पर ही तय होगी ? सचिन अपने देश, अपनी टीम और अपने खेल के लिए कितने ईमानदार हैं, ये बताने के लिए क्या वो वाडा के सर्टिफिकेट के मुहताज हैं ? नहीं और कभी नहीं। क्रिकेट मैदान पर धूम मचाने वाले अपने बाकी हीरो भी उतने ही ईमानदार हैं। क्रिकेट को डोपिंग का डंक कभी भारतीय क्रिकेटर्स ने नहीं चुभोया। ये काम पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों ने ही किया है। फिर वो वाडा के खिलाफ कहां हैं। वो तो बस वाडा के उस नियम को लेकर ही एतराज कर रहे हैं, जिसे लेकर उन्हें लगता है कि वो उनकी निजता को निजी नहीं रहने देगा। और अगर बीसीसीआई इस मामले पर खिलाड़ियों के पीछे खड़ा है तो गलत क्या है ? अगर वो चाहता है कि आईसीसी वाडा से करार खत्म करे और डोपिंग रोकने के लिए अपना ही संगठन खड़ा करे तो क्या ये मांग गलत है ?
सही मायने में दुनिया भर का क्रिकेट बीसीसीआई के पैसे से ही चलता है। आईसीसी हो या फिर क्रिकेट खेलने वाले बाकी देशों में से किसी का भी बोर्ड हर कोई बीसीसीआई पर निर्भर है। क्रिकेट बिरादरी में चौधरी की हैसियत रखकर चौधराहट दिखाना क्या गलत है ? जरा, पूछकर देख लीजिए, अपने देश के किसी भी शख्स से। जब नेपाल और बांग्लादेश सरीखे पिद्दी देश हमें आंखें दिखाते हैं, हमारी अनदेखी करते हैं, हम पर आरोप मढ़ते हैं तो उन्हें कैसा लगता है। विदेशी मामलों की ज्यादा जानकारी नहीं रखने वाले भी बताने लगते हैं कि अगर भारत नेपाल- बांग्लादेश को मदद देना बंद कर दे तो उसके होश ठिकाने आ जाएं। लेकिन फिर भी हम क्या ऐसा कर पाते हैं। दक्षिण एशिया में हम खुद को भले ही चौधरी मानें लेकिन हमारे सारे पड़ोसी चीन की गोद में बैठने के लिए उछल रहे हैं। भारत सिर्फ क्रिकेट का ही बाजार नहीं है। हर मामले में हमारा बाजार अव्वल है। ताकत और तरक्की में भी हम कम नहीं हैं। काबलियत का तो कहना ही क्या ? अगर हम अपनी पर अड़ जाए तो दुनिया के किसी भी देश को दबाव में ले सकते है तो फिर हमने शर्म अल शेख में ऐसा कदम क्यों उठा दिया जिसके बाद हर आमोखास को लगा कि हम पाकिस्तान के आगे झुक गए। पाकिस्तान से तो हम हर मामले में आगे हैं। शायद अमेरिका से दोस्ती के मामले में भी। कम से कम देश चलाने वाले भ्रम तो ऐसा ही बनाते हैं तो फिर बार- बार क्यों लगता है कि हम अमेरिका के दबाव में दब जाते हैं। क्या दबना और झुकना ही शालीनता और महानता की पहचान है। क्या ये हमारा स्वभाव और आदत बन चुका है। क्या इसीलिए हम बीसीसीआई को गलत और वाडा को सही बता रहे हैं। आपका जवाब आपके पास होगा। हमारा तो यही मानना है कि चौधरी वही है जो चलाए चौधराहट। अमेरिकी से भी पूछ लीजिए।

Sunday, July 26, 2009

ये आपने क्या किया मनमोहन जी

सुरेश जायसवाल
मिस्र के शर्म अल शेख में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच मुलाकात के बाद जारी साझा घोषणा पत्र से एक बात तो साफ हो गयी है कि भारतीय कूटनीति अमेरिका के दबाव में है । इसी दबाव का ही नतीजा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कूटनीति में मात खा गये और वो सब कुछ कर आए जो आज से पहले नहीं हुआ था । मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद से ही भारत का रुख यही रहा है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ कारर्वाई नहीं करेगा और मुंबई के गुनहगारों को सजा नहीं दिलाएगा , उससे कोई बात नहीं होगी ।

करीब महीने भर पहले पाकिस्तानी राष्ट्रपति जरदारी के साथ मुलाकात में मनमोहन ने जरदारी को जिस तरीके से खरी खरी सुनाई थी उससे भी भारत का यही रुख साफ हुआ था । जरदारी के सामने मनमोहन सिंह ने जिस तरीके से अपनी बात रखी वो भारतीय कूटनीति की ही जीत थी लेकिन महीने के भीतर ही अचानक न जाने क्या हो गया कि मनमोहन सिंह ने वो सब कुछ गंवा दिया जो भारत ने पिछले सात आठ महीने की कूटनीतिक मेहनत के बाद हासिल किया था । शर्म अल शेख में दोनों ही देशों के नेता जब मिले तो उन पर अमेरिका का इस बात का दबाव था कि बातचीत का कुछ नतीजा निकले ।अमेरिका के इसी दबाव का फायदा पाकिस्तान ने उठाया और भारतीय कूटनीति बैकफुट पर आ गयी । दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच बातचीत के बाद जो साझा बयान जारी हुआ उसमें भारत ने ये बात मान ली कि आतंकवाद पर बात किए बिना पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता जारी रहेगी । मुंबई हमले के बाद से भारत दुनिया भर में ये कहता रहा है कि जब तक आतंक के आकाओं को सजा नहीं दी जाती तक शांतिवार्ता का कोई सवाल ही नहीं है लेकिन पता नहीं ये कौन सा दबाब था कि अपनी सारी शर्तें भूलकर भारतीय खेमा पाकिस्तान के आगे नतमस्तक हो गया ।

साझा घोषणा पत्र में वही सब कुछ कहा गया जो पाकिस्तान चाहता था । पहले तो पाकिस्तान ने आतंकवाद की शर्त को दूर करवा दिया और लगे हाथ बलूचिस्तान का मसला भी उसमें शामिल करवा लिया । साझा घोषणा पत्र में बलूचिस्तान का मसला शामिल करवा कर भारतीय खेमे ने जो भूल की है , उसकी भरपाई करना मुश्किल ही है ।
दरअसल घोषणापत्र में बलूचिस्तान की बात डलवा कर पाकिस्तान ने भारत से ये बात कबूल करवा ली है कि वहां जारी अशांति में उसका हाथ है । घोषणा पत्र जारी होने के बाद से पाकिस्तानी सरकार ये कहती फिर रही है कि भारत ने बलूचिस्तान की अस्थिरता में हाथ होना कबूल कर लिय़ा है । यही नहीं ये भी खबरें आ रही है कि पाकिस्तान सरकार भारत को इस बारे में सबूत सौंपने वाली है कि बलूचिस्तान की हिंसा में उसका हाथ है । कुल मिलाकर बलूचिस्तान का मसला मनमोहन सरकार और भारतीय विदेश मंत्रालय के गले की हड्डी बन गया है । इस मामले पर किरकिरी होते देख विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के हाथ पांव फूल गए हैं । अधिकारियों की हताशा का आलम ये है कि विदेश सचिव शिवशंकर मेनन को ये कहना पड़ा कि मसौदे की ड्राफ्टिंग में गडबड़ी की वजह से ऐसा हो गया । आखिरकार मेनन ये कैसे कह सकते हैं कि ड्राफ्टिंग की वजह से ऐसी गलती हो गयी । जहां भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बातचीत के बाद ऐसा घोषणापत्र जारी कर कर रहें हो जिस पर पूरे दुनिया की नजरें गड़ी हों , उस घोषणा पत्र के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को शब्द ही नहीं मिले ? मेनन कुछ भी कह लें लेकिन ये बात साफ है कि शर्म अल शेख में भारतीय कूटनीति की बहुत बड़ी हार हुई है । मामले की गंभीरता को कांग्रेस भी समझ रही है और इसलिए वो इस मामले पर कन्नी काटते हुए सारी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह पर डाल रही है । दरअसल कांग्रेस के भी एक वर्ग का मानना है कि कहीं न कहीं मनमोहन की कूटनीतिक और राजनीतिक अपरिपक्तवता का फायदा पाकिस्तान ने उठाया । मामले पर लीपापोती करने के लिए ही सरकार अब ये सफाई भी दे रही है कि पाकिस्तान के साथ किसी भी स्तर पर बातचीत की गुंजाइश नहीं है । अगर पाक के साथ बातचीत नहीं करनी है तो फिर शर्म अल शेख के घोषणा पत्र में इस बात का जिक्र क्यों नहीं किया गया । घोषणा पत्र में आखिर इस बात पर जोर क्यों नहीं दिया गया कि जब तक आतंक के आकाओं पर कार्रवाई नहीं होती तब तक बातचीत नहीं हो सकती ।
सच्चाई ये है कि भारतीय कूटनीति पूरी तरह से अमेरिका के दबाब में है । परमाणु समझौते के बाद तो यूपीए की सरकार अमेरिका पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान दिख रही है । यही वजह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की यात्रा के दौरान भी सरकार ने अमेरिका के साथ END -USE-MONITORING AGREEMENT ( EUMA ) पर दस्तखत कर दिए ।इस समझौते के बाद भारत को अमेरिकी से खरीदे गए सैनिक साजो सामान की अमेरिका की शर्तो के तहत निगरानी करानी होगी । अब अमेरिका ही ये तय करेगा कि भारत उससे खरीदे गए हथियारों का सही इस्तेमाल कर रहा है या नहीं । कुल मिलाकर समझौते के बाद भारत की सामरिक तैयारियां भी अमेरिकी निगरानी में होगीं । हालांकि अमेरिका में ये कानून 1984 में ही बन गया था और पहले भी कई समझौतों में इस कानून का पालन हुआ है लेकिन पहले ये कुछ खास तकनीक की खरीद तक ही सीमित था । अब सरकार ने हर तरह के रक्षा खरीद सौदों के लिए इस समझौते को मंजूरी दे दी है । कुल मिलाकर सरकार वही करना चाह रही है जो अंकल सैम चाहते हैं । लेकिन आने वाले दिनों में भारत को अमेरिका का ये पिछलग्गूपन भारी पड़ सकता है क्योंकि इतिहास तो यह कहता है कि अमेरिका अब तक किसी का सगा नहीं हुआ है ।

Friday, July 17, 2009

हम झूठे ही भले

वात्सल्य राय
सच... बहुत मुश्किल है... सुनना भी और बोलना भी... सच।

यूं तो हम सब सच्चे हैं। दिल से... जज्बात से... जुबान से और इरादों से भी। सच्चे हिंदुस्तानी। सच्चाई हमारी रगों में खून की तरह दौड़ती है। फिर भी सत्यवादियों की गिनती उंगलियों पर ही हो जाती है। धर्मराज युधिष्ठिर... राजा हरिश्चंद्र...और महात्मा गांधी। एक धर्मराज थे। दूसरे सनातन सत्यवादी और तीसरे महान आत्मा।

सत्य का व्रत तमाम दूसरे भी लेते हैं... लेकिन पालन कितने कर पाते हैं, कहना मुश्किल है। व्रत इसलिए नहीं टूटता कि हम सच बोलने से डरते हैं। लेकिन डरते जरूर हैं। इसे डर नहीं तो लिहाज कह लीजिए। बात कुछ यूं हैं कि हमाम का हाल सब जानते हैं लेकिन बोलने से परहेज करते हैं। आखिर हमारे लिए पर्देदारी के मायने हैं।

कभी सच पर ब्रेक इसलिए लगाया जाता है कि अगर ये सामने आ जाए तो सच्चाई का रास्ता बंद हो सकता है। महाभारत में अश्वत्थामा हाथी के वध के बाद पांचजन्य का उदघोष ऐसे ही सच को थामने के लिए हुआ था। ये सच रोकने वाले थे श्री सत्यनारायण भगवान श्री कृष्ण। क्या वो नहीं जानते थे कि सच की आवाज दबी तो धर्मराज को एक उंगली गंवानी होगी। लेकिन वहां सच का गला घोंटना जरूरी था। सच्चाई को बचाने के लिए।

सच हमारी संस्कृति है तो हमारे संस्कार ये भी सिखाते हैं कि हम ऐसा सच ना बोलें जिससे दूसरे को ठेस लगे। जिनकी आंखें नहीं होंती हम सूरदास कहते हैं। नेत्रहीन से कोई नाराजगी हो तो धृष्टराष्ट्र कह लेते हैं लेकिन अंधा कहने से परहेज ही करते हैं। ये ही है हमारा सच।

तो फिर क्यों करें हम सच का सामना जबकि हम हमेशा ही सच्चे हैं और जब कभी सच का साथ हमारे हाथ से दूर होता है तो हम जानते हैं कि ये सच्चाई को एक खूबसूरत शक्ल देने की कोशिश है। सच... कोई करोड़ नहीं अरब भी देदे तो हम वो सच नहीं कहेंगे जो दूसरों को पहुंचाता है ठेस। माफ कीजिएगा। हम झूठे ही भले हैं।

Tuesday, July 14, 2009

सवा लाख बनाम पनेसर

वात्सल्य राय
अचानक गुरू महाराज याद हो आए। ' सवा लाख से एक लड़ाऊं '। पापा भी साथ मैच देख रहे थे और कॉलिंगवुड के आउट होते ही, उन्होंने कंगारुओं की जीत तय मान ली थी। उनका कहना था, ' पनेसर के बस का कुछ नहीं है '।

क्रिकेट को लेकर अगर बहस हो तो पापा के मुकाबले मेरे अनुमान नहीं ठहरते। वो मेरिट के मुताबिक जजमेंट देते हैं और मेरे लिए हमेशा ही भावनाओं की अहमियत ज्यादा होती है। यूं अंग्रेज हार भी जाते तो अपना क्या जाता ? फिर कंगारू जीत के हकदार तो थे ही। अपने सौरव गांगुली को छोड़कर कितने लोगों ने भाव दिया था पंटर एंड कंपनी को। थॉमसन और इयान चैपल तक इस टीम को किसी गिनती में नहीं रख रहे थे। ब्रेट ली की चोट और प्रैक्टिस मैच में पोंटिंग की नाकामी ने मुश्किल और बढ़ा दी थी। फिर कप्तान साहब फ्लैट पर पिच टॉस भी हार बैठे। लेकिन पहले गेंदबाज और फिर बल्लेबाज... क्या जान लगाकर खेले। पोंटिंग तो रूकने को तैयार ही नहीं थे। नॉर्थ और हेडिन भी शतक ठोक गए। गेंदबाजी में मजबूत माने गए अंग्रेज सिर्फ 6 विकेट ले पाए। और वही गेंद जब कंगारूओं के हाथ आई तो पिच विकेटों का गिफ्ट देने लगी... क्या पीटरसन... क्या स्ट्रॉस... क्या प्रायर... क्या फ्लिंटॉफ... सब लाइन लगाकर चल पड़े। सिर्फ कॉलिंगवुड ही हार के बीच अड़े थे और जब वो भी चल दिए तो जीत तो बनती थी बॉस। लेकिन पता नहीं क्यों अब कंगारूओं का जीतना अच्छा नहीं लगता। अंग्रेजों तक का उनसे हारना रास नहीं आता।

जबसे अपने सरदार हरभजन सिंह को इस टीम ने घेरा है, तब से ये टीम दिल से उतर ही गई है। तो उम्मीदें एक और सरदार यानी पनेसर से लगा दीं। किसी को भरोसा रहा हो या नहीं पर दिल कह रहा था कि पनेसर इस टेस्ट में खालिस और खरा उतरेंगे। चुनौती आसान नहीं थी। बारह ओवर बाकी थे और कंगारूओं को सिर्फ एक गलती का इंतजार था। और इस गलती की उम्मीद पनेसर से ही थी। लेकिन वाह रे पनेसर बेदाग 35 गेंद खेल गए। पनेसर पर दबाव बनाने की कोशिश में कंगारू एंडरसन का दमखम भी टेस्ट नहीं कर पाए। और कंगारूओं की मुट्ठी से जीत फिसल गई। ये सीरीज का टर्निंग प्वाइंट भी हो सकता है। कंगारूओं का भारत दौरा याद है ना... बैंगलोर में सौरव गांगुली ने ऐसे ही मैच बचाया था ... और फिर मोहाली में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को पीटा था... तो लॉर्ड्स में अंग्रेज ऐसा क्यों नहीं कर सकते...

Sunday, May 24, 2009

डीएमके की राजनीति

सुरेश जायसवाल
मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस की नयी सरकार जब सत्ता संभालने की तैयारी कर रही थी तभी डीएमके ने कर दिया रंग में भंग । एक तरफ जहां सोनिया गांधी मनमोहन सिंह के साथ राष्ट्रपति भवन में शपथ लेने वाले मंत्रियों की सूची तैयार कर रही थीं वहीं डीएमके प्रमुख करुणानिधि ज्यादा मंत्रिपद की चाह में कोपभवन में जाकर बैठ गए । अब कांग्रेस आलाकमान के सामने समस्या ये कि वो अपने इस पुराने सहयोगी को समझाए कैसे । डीएमके को मनाने की कई कोशिशें की गयीं लेकिन वो टस से मस नहीं हुए । और आखिरकार नई सरकार को बिना डीएमके के मंत्रियों के ही शपथ लेनी पड़ी ।
कुल मिलाकर यूपीए सरकार की शुरुआत ही नहीं ठीक रही । वैसे शुरुआत तो कांग्रेस की पिछली सरकार की भी ठीक नहीं थी लेकिन उसने पांच साल कार्यकाल पूरा किया था । पांच साल पहले भी सरकार बनते समय डीएमके ने मंत्रिपद को लेकर ड्रामा किया था । दरअसल डीएमके की इस बार की सत्ता की नौटंकी के पीछे का कारण पारिवारिक है । डीएमके प्रमुख करुणानिधि अपने परिवार के मोह में अंधे हो गए हैं । करुणानिधि के सामने समस्या ये है कि वो अपने बेटे अझागिरी , बेटी कनीमोझी नाती दयानिधि मारन तीनों के लिए ही पद चाहते हैं । यहीं नहीं पार्टी के समीकरण को दुरुस्त रखने के लिए टी आर बालू और ए राजा को भी सत्ता की मलाई दिलाना चाहते हैं । करुणानिधि का यही परिवार मोह उन्हें मुसीबत में डाले हुए हैं ।
अब ये कहां की राजनीति है कि एक ही परिवार के तीन तीन सदस्यों को मंत्री के पद से नवाजा जाए । लेकिन यही तो क्षेत्रीय दलों की राजनीति है । अपने समर्थन के बदले में हर प्रकार की शर्ते मनवा लेना इन क्षेत्रीय दलों की पुरानी आदत रही है । समर्थन के बदले में राज्य के हितों के लिए कुछ शर्तें मनवा लेना तो जायज कहा जा सकता है लेकिन पूरे परिवार को सत्ता में हिस्सेदारी दिलवाना केवल ब्लैकमेलिंग ही कहा जाएगा । वैसे करुणानिधि का परिवारवाद केवल यहीं खत्म नहीं होता है । राज्य की राजनीति में भी करुणानिधि के परिवार का ही बोलबाला है । करुणानिधि के बेटे स्टालिन राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी के वारिस हैं । कुल मिलाकर करुणानिधि पूरे परिवार को ही सत्ता दिला देना चाहते हैं । लेकिन कांग्रेस भी डीएमके के इस दबाब में नहीं आना चाहती है । कांग्रेस को डीएमके के परिवार से तो समस्या नहीं है लेकिन उसे असली दिक्कत बालू और राजाके नाम को लेकर है । राजा और बालू दोनों ही पिछली सरकार में मंत्री थे । कांग्रेस आलाकमान दोनों ही मंत्रियों की कारगुजारी से वाकिफ है । राजा और बालू दोनों के ही दामन पर भ्रष्टाचार के दाग हैं । कांग्रेस आलाकमान और खासतौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बार अपने मंत्रिमंडल में किसी भी प्रकार का दाग नहीं देखना चाहते हैं । यही वजह है कि कांग्रेस दोनों के नाम पर आनाकानी कर रही है । लेकिन गठबंधन की राजनीति की मजबूरियां आखिरकार कांग्रेस को इन दोनों को मंत्रिमंडल में शामिल करने पर मजबूर कर देगी । अब देखना है कि डीएमके कब तक कांग्रेस के साथ ये ब्लैकमेलिंग का खेल खेलती रहेगी ।

Sunday, May 17, 2009

मेरा सुंदर सपना टूट गया

सुरेश जायसवाल
लोकसभा चुनावों के नतीजोंने कांग्रेस की तो बल्ले बल्ले कर दी लेकिन कितनों के तो सपने ही तोड़ दिए। चुनाव नतीजों से पहले बहुत से लोगों ने तरह तरह के सपने संजोकर रखे थे लेकिन इन कमबख्त नतीजों ने सारे सपनों पर पानी फेर दिया । नतीजों ने कितनों के सपनों को तो ऐसा तोड़ा कि वो कहीं के नहीं रहें लेकिन कुछ तो फिर से कुर्ता झाड़ कर खडे हो गए हैं ।

टूटे सपनों की इस कड़ी में बात करते हैं सबसे पहले लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी की । चुनाव नतीजों ने सबसे बड़ा झटका किसी को दिया है तो वो हैं पीएम इन वेटिंग आडवाणी । आडवाणी की किस्मत में शायद राजयोग लिखा ही नहीं था , अब उनको शायद पीएम इन वेटिंग से ही संतोष करना पड़ेगा । वैसे तो आडवाणी ने जी बरसों से पीएम बनने का सपना संजो कर रखा था लेकिन कभी वाजपेयी ने तो कभी पार्टी की अंतरकलह से उनके सपनों को साकार नहीं होने दिया और आखिरकार आडवाणी जी पीएम की कुर्सी का वेट करते ही रह गए । आडवाणी की उम्र और मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए तो ऐसा ही लगता है कि अब आने वाले समय में उनका ये सपना पूरा होने से रहा । अब आडवाणी जी अगर अगले लोकसभा चुनावों के लिए तैयारी करें तो बात और है लेकिन ऐसा होना मुश्किल ही लग रहा है । ''मजबूत नेता'' आडवाणी जब तथाकथित ''कमजोर पीएम ''मनमोहन सिंह से मुकाबला नहीं कर सके तो अगले चुनावों में कांग्रेस के संभावित पीएम उम्मीदवार राहुल गांधी का क्या मुकाबला कर सकेंगे । खैर हम आडवाणी के सपने के टूटने पर केवल सहानुभूति ही व्यक्त कर सकते हैं ।

अब बात करते हैं कुछ और लोगों का जिनके सपने चुनाव नतीजों की आंधी में बह गए । सीपीएम महासचिव प्रकाश करात भी उन्हीं लोगों में शामिल हैं जो आज अपने सपने टूटने पर आंसू बहा रहे होंगे । करात ने भी चुनावों से पहले देखा था एक सपना , सपना तीसरे मोर्चे की सरकार का । लेकिन वाह री जनता जनार्दन कैसी बेरहमी से इस सपने को चकनाचूर कर दिया । लेफ्ट पहले तो अपना ही गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल नहीं बचा सका । बची खुची उम्मीदें जयललिता , माया और नायडू के खराब प्रदर्शन ने पूरी कर दी । खैर अब करात साहब का सपना तो पूरा नहीं हो सका लेकिन वो इससे निराश बिल्कुल नहीं है और अगले चुनाव में गैर कांग्रेस ,गैर बीजेपी सरकार की तैयारियों में लग गए हैं ।


अब बात मराठा सरदार शरद पवार के सपने की । शरद पवार वैसे तो इन नतीजों पर खुशी जाहिर कर रहे हैं लेकिन पवार साहब ये पब्लिक है सब जानती है । ये बात तो सबको पता है कि नतीजों ने आपका दिल ऐसा तोड़ा है कि आप अपने आंसू दिखा भी नहीं पा रहे हैं । पवार साहब ने खंडित जनादेश की हालत में पीएम बनने का सपना संजो रखा था । पवार साहब का एक पैर तो यूपीए में था लेकिन दूसरा पैर वो तीसरे मोर्चे के साथ जोड़े हुए थे । पवार ने अपनी तरफ से पीएम बनने की हर गोटी सेट कर रखी थी लेकिन ईवीएम मशीनें खुलीं तो सपने पर जैसे घडों पानी पड़ गया । पवार ने लेफ्ट से लेकर पटनायक तक , जया से लेकर माया तक और नीतीश से लेकर शिवसेना तक से पींगे बढ़ा रखीं था लेकिन सारी मेहनत पर नतीजों ने पानी फेर दिया ।

चुनाव नतीजों ने दो महिलाओं के सपने पर भी पानी फेर दिया । ये दो महिलाएं है मायावती और जयललिता । बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी सपना देखा था कि वो बड़ी संख्या में सीटें जीतकर लाएंगी और सत्ता की जोड़तोड़ के जरिए पीएम की कुर्सी हासिल कर लेंगी । लेकिन न तो माया का दलित समाज का नारा काम आया और न ही सर्वसमाज का । दलित पीएम बनने की उनकी हसरत अधूरी ही रह गयी । कुछ ऐसा ही सपना टूटा है अम्मा का । अम्मा यानी एआईएडीएमके नेता जयललिता । जयललिता को तो इस बार तमिलनाडु में क्लीन स्वीप की उम्मीद थी । हर कोई कह रहा था कि अम्मा तो इस बार डीएमके का सूपडा साफ कर देंगी । वैसे भी तमिलनाडु की जनता का ये तरीका रहा है कि वो एक बार एक पार्टी और अगली बार दूसरी पार्टी को सत्ता का स्वाद चखने का मौका देती हैं । लेकिन जनता ने ये भ्रम भी तोड़ दिया और दिल्ली की सत्ता की मलाई चखने का अम्मा का ख्वाब अधूरा ही रह गया ।

ये तो थे वो बड़े बड़े सपने जिन्हें जनता की मार ने तोड़ दिये , इसके अलावा छोटे मोटे सपने तो कितने ही टूट गए जिनकी कोई लिस्ट ही नहीं है । ये तो बातें थी नेताओं के सपने की । चुनावी नतीजों ने मीडिया के सपने को भी चकनाचूर कर दिया है । खासतौर पर टीवी चैनल के लोगों ने तो क्या क्या सपने सजा रखे थे । उम्मीद थी बहुमत तो किसी को मिलगा नहीं और फिर होगी जमकर जोड़तोड़ । इस जोड़तोड में टीवी चैनलों को भी अपनी दूकान चमकने का सपना था । लग रहा था कि करीब पखवाड़े तक तो ये गणित चलेगा ही कि कौन किधर जा रहा है , कौन किससे मिल रहा है ,किसकी सरकार बनेगी वगैरह वगैरह । लेकिन नतीजों ने इसका मौका ही नहीं दिया और दो घंटे के अंदर ही साफ हो गया कि मनमोहन की अगुवाई में यूपीए की ही सरकार बनने जा रही है । खैर सपने तो सपने ही होते है कुछ पूरे होते हैं तो कुछ अधूरे ही रह जाते हैं । हम तो बस ये ही कह सकते हैं कि भैया ये तो जनता है बड़े बड़ों के सपने में आग लगा देती है ।

Wednesday, May 13, 2009

देखो मैंने देखा है इक सपना...

सुरेश जायसवाल

पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव का आखिरी समर पूरा होते ही 7 रेसकोर्स रोड पर कब्जे की जंग तेज हो गयी है । हर छोटा बड़ा राजनीतिक दल और मोर्चा सत्ता की रेस में शामिल हो गया है । इस रेस में शामिल दलों और मोर्चों की न तो कई विचारधारा है और न ही कोई राजनीतिक मूल्य । रेस में शामिल हर दल और मोर्चा या तो सत्ता हासिल करने की फिराक में है या फिर है मंत्री की कुर्सी पर नजर । और तो और इस रेस में इस बार बार लेफ्ट फ्रंट भी शामिल है । कथित तौर पर विचारधारा की लड़ाई के लंबरदार लेफ्ट के महासचिव प्रकाश करात भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजरें गडाए हुए हैं । तभी तो उन्हें ये कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि मौका पड़ने वो भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं

वैसे तीसरे मोर्चे की सरकार का सपना तो करात ने काफी पहले से ही देखना शुरु कर दिया था । इसी सपने को पूरा करने के लिए ही करात ने परमाणु करार के मसले पर यूपीए की सरकार से समर्थन वापस लिया । इसके बाद से करात ने कुर्सी हासिल करने का ताना बाना बुनना शुरु कर दिया । करात के इस सपने का आधार है तीसरा मोर्चा । गैर कांग्रेस और गैर बीजेपी की सरकारों के विकल्प के तौर पर करात ने ये तीसरा मोर्चा खडा किया है । करात को उम्मीद है कि ये मोर्चा ही उनको सात रेसकोर्स की गद्दी तक पहुंचा देगा और वो ऐसा काम कर दिखाएंगे जो लेफ्ट के चाणक्य रहे ज्योति बसु भी नहीं कर सके । वैसे करात का ये सपना कितनी हकीकत है और कितना फसाना ये तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही पता चलेगा ।

वैसे आइये हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर करात के सपने में है कितना दम । करात के तीसरे मोर्चे में चार लेफ्ट पार्टियों के अलावा मायावती की बीएसपी , एआईएडीएमके की जयललिता ,पीएमके के रामदौस , एमडीएमके के वाइको , तेलगूदेशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू , टीआरएस के चंद्रशेखर राव और बीजेडी के नवीन पटनायक शामिल हैं । करात को उम्मीद है कि उनके साथ पवार जैसे कई और लोग भी शामिल होंगे । करात को उम्मीद है कि तमिलनाडु में जयललिता का गठबंधन स्वीप करेगा तो आंध्र में नायडू को मिलेंगी काफी सीटें । इसके अलावा यूपी में मायावती के हाथी से करात को काफी उम्मीदें है । करात को लगता है कि तीनो मिलाकर 70-80 सीटें हासिल कर लेगें । करात का गणित है कि लेफ्ट , बीजेडी और बाकी दलों को मिलाकर मोर्चा 150 से 160 सीटें हासिल कर लेगा । इसके आगे की करात की गणित कांग्रेस के समर्थन पर टिकी है । लेफ्ट बार बार ये कह रहा है कि वो इस बार कांग्रेस को समर्थन देगा नहीं बल्कि कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष सरकार के लिए समर्थन देना होगा । लेकिन करात साहब ये भूल जाते हैं कि जिस कांग्रेस से उन्होंने छह महीने पहले ही समर्थन वापस लिया है वो उन्हें समर्थन क्यों देगी । फिर भी करात को लगता है कि सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के नाम पर कांग्रेस से समर्थन मिल जाएगा ।

उधर कांग्रेस भी किसी से कम नहीं है । कांग्रेस ने तो पहले से ही ये राग अलापना शुरु कर दिया है कि अगर सांप्रदायिक तत्वों तो सत्ता से दूर रखना है कि सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को यूपीए को समर्थन करना होगा । अब सवाल ये है कि दोनों में से कौन है जो एनडीए को सत्ता से बाहर रख सकता है । कांग्रेस बार बार ये कह रही है कि वो किसी को समर्थन देगी नहीं केवल समर्थन लेगी । अब करात बाबू ये सवाल तो उठा ही सकते हैं कि आखिर कांग्रेस हर बार दूसरों से समर्थन क्यों लेती है , कभी तो वो भी किसी दूसरे दल का समर्थन करे । मान लिया कि अगर कांग्रेस ने समर्थन दे भी दिया तो आखिर कितने दिनों तक । कांग्रेस का इतिहास तो यही बताता है कि वो सरकार बनाने में नहीं गिराने में भरोसा रखती है । खैर समर्थन लेने या देने की बात तो तब आएगी न तीसरा मोर्चा स्थिर रहेगा । तीसरे मोर्च में टूटफूट की शुरुआत हो चुकी है ,सबसे पहले टीआरएस करात की गोद से उठकर एनडीए के पाले में जा बैठा है । यहीं नहीं टीआरएस ने ये भी भरोसा दिलाया है कि वो कुछ और साथियों को भी एनडीए के पाले में लाएंगे । यानी रिजल्ट आए नहीं तीसरा मोर्चा बिखरना शुरु । वैसे करात ने जिन पार्टियों के बल पर तीसरे मोर्च की सरकार का सपना देखा है वो भी किसी विचारधारा से बंधे नहीं है बल्कि बिन पेंदी के लोटे हैं । करात को ये नहीं भूलना चाहिए तीसरे मोर्चे के उनके सहयोगी नायडू , माया , जयललिता , रामदौस , वाइको , देवगौड़ा और पटनायक कभी न कभी एनडीए के साथ रहें हैं । इन सभी लोगों को मौका पड़ते ही एनडीए के पाले में जाने से रोकना करात के लिए खासा मुश्किल होगा । खासकर जया और माया तो केवल सौदेबाजी की मास्टर हैं , जहां ज्यादा हाथ में आया उधर ही हो लिए चाहे वो यूपीए हो या फिर एनडीए । तब फिर आपको सपने का क्या होगा करात साहब । वैसे करात साहब को ज्यादा दिन परेशान होने की जरुरत नहीं जैसे ही ईवीएम मशीनें खुलेंगी , सपने की हकीकत और फसाने का अंदाजा हो जाएगा ।

Monday, May 11, 2009

साथ रहा न जाय, दूरी सही न जाय

लोकतंत्र का ऐसा ड्रामा शायद ही भारत ने कभी इससे पहले देखा हो। दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र ने इससे ज्यादा शर्मनिरपेक्ष चुनाव इससे पहले नहीं देखा होगा। त्रिशंकु संसद का ऐसा अंदेशा और ऊपर से कुर्सी का ऐसा मोह की आखिरी चरण का चुनाव नजदीक आ गया लेकिन अभी तक ये पता नहीं चल पा रहा है कि कौन किसके खिलाफ लड़ रहा है। एक पल कोई किसी को गाली दे रहा है, दूसरे ही पल ये सोच कर उसे सराह रहा है कि कहीं कुर्सी के लिए उसकी जरूरत न पड़ जाय। सब एक दूसरे के दोस्त हैं। ऐसे दोस्त, जो वक्त आने पर दुश्मन से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकते हैं।
अगर यूपीए की ही बात करें तो सब एक दूसरे के खिलाफ हैं लेकिन सब एक दूसरे के साथ दोस्ती की दुहाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय जनता दल यूपीए का एक अहम घटक दल है लेकिन कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रहा है। कांग्रेस की आलोचना करके वोट मांग रहा है लेकिन लालू साथ ही ये भी कहते हैं कि हम यूपीए के साथ हैं और साथ सरकार बनाएंगे। राम विलास पासवान और मुलायम सिहं यादव लालू के साथ हैं। कांग्रेस और आरजेडी, लोकजनशक्ति पार्टी, समाजवादी पार्टी का गठबंधन एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं लेकिन सब फिर भी दोस्त हैं।
लेफ्ट चुनाव से पहले ही सरकार से कन्नी काट चुका है लेकिन सबसे बुरा हाल उसी का है। प्रकाश करात कहते हैं-कांग्रेस को समर्थन बिल्कुल नहीं। सीताराम येचुरी कहते हैं कि सारे विकल्प खुले हुए हैं। अब करात के सुर भी बदल गए हैं। प्रणव मुखर्जी ने कह दिया कि केंद्र में सरकार बनाने में लेफ्ट को 250 साल लग जाएंगे लेकिन फिर भी बुद्धदेव भट्टाचार्य के सुर नरम ही रहे। कहा-कांग्रेस हमारे लिए अछूत नहीं। दरअसल जन्नत की हकीकत सबको पता है। कांग्रेस की ओर से सफाई भी आ गई। पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि लोकल राजनीति की मजबूरी है ऐसी बयानबाजी। पश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस और लेफ्ट एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं और इसलिए दोनों एक दूसरे के खिलाफ ऐसे हमले करते रहे हैं। यानि राज्य के लिए एक राजनीति और केंद्र की कुर्सी के लिए दूसरी राजनीति। पहले कम से कम सरेआम इस सच्चाई को नेता स्वीकार नहीं करते थे लेकिन अब जनता के प्रति जवाबदेही की कोई भावना नहीं रह गई है, इसलिए पूरी निर्लज्जता के साथ इसे स्वीकार किया जा रहा है। जिस वोटर से लेफ्ट की आलोचना करके आप वोट मांग रहे हैं, वो अगर बाद में ये सवाल करे कि कुर्सी के लिए उसी लेफ्ट के गले क्यों लग लिए तो क्या जवाब देंगे सिंघवी साहब आप? आखिर बीजेपी की सांप्रदायिकता के हौवा का बहाना कब तक बनाते रहेंगे? पब्लिक इतनी बेवकूफ भी नहीं। दरअसल लगातार पतनोन्मुख भारतीय राजनीति के दोहरेपन का इससे शर्मनाक उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता।
समाजवादी पार्टी की बात करें तो उसकी लड़ाई अपने आप से ही है। पूरे वोट की राजनीति अमर सिंह बनाम आजम खान के खिलाफ चल रही है। ऐसे में ये बीजेपी या बीएसपी का मुकाबला क्या खाक करेंगे? कोई मुद्दा नहीं। बस अमर सिंह आजम खान को गरियाए जा रहे हैं और आजम खान अमर सिंह पर हमला बोले जा रहे हैं।
ममता पहले बीजेपी की हमराह थी, अब कांग्रेस के साथ हैं लेकिन रह-रह कर जिस तरह कांग्रेस का लेफ्ट प्रेम उमड़ रहा है, उससे उन्हें अपने वोटरों के सामने अच्छी खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि ममता का पूरा अस्तित्व ही लेफ्ट के विरोध पर टिका हुआ है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को हर कोई अपने पाले में लाना चाहता है। शायद लालू-पासवान को सबक सिखाने के लिए कांग्रेस नीतीश को पटाना चाहती है। राहुल नीतीश को तारीफ करते हैं और लालू-पासवान मन मसोस कर रह जाते हैं। हालात ऐसे कि चुप रहा भी नहीं जाता, कुछ कहा भी नहीं जाता। मोइली ने नीतीश पर वार किया तो कांग्रेस ने उनकी छुट्टी कर बता दी कि किसी भी विरोधी के खिलाफ कम से कम 16 मई तक कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन अब जब नीतीश पिघलते नहीं दिख रहे हैं तो कांग्रेस उनकी धर्मनिरपेक्ष पहचान पर सवाल उठा रही है। दाल गले तो आप अच्छे, नहीं गले तो आप गंदे।
दरअसल राजनीतिक दलों को जो बात नहीं समझ आ रही है और जो बात उन्हें जल्द समझ लेना चाहिए--वो ये है कि ये खंडित जनादेश कहीं न कहीं इस बात का संकेत जरूर है कि जनता का विश्वास उन पर से टूटा है। जनता का विश्वास जीतने की जगह वो खंडित जनादेश को सौदेबाजी की शक्ल देने में तूले हुए हैं और इस तरह वो अपनी विश्वसनीयता भी खोते जा रहे हैं। जनता में ये भाव तो पहले ही बैठ चुका है कि राजनीति में आदर्श और सिद्धान्त के लिए कोई जगह नहीं है। राजनीतिक दलों का अभी जो आचरण है, उससे जल्दी ही उन्हें ये भी भरोसा हो जायेगा कि ये विश्वास करने लायक नहीं है। जाहिर है हम एक खतरनाक भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं।