सुरेश जायसवाल
मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस की नयी सरकार जब सत्ता संभालने की तैयारी कर रही थी तभी डीएमके ने कर दिया रंग में भंग । एक तरफ जहां सोनिया गांधी मनमोहन सिंह के साथ राष्ट्रपति भवन में शपथ लेने वाले मंत्रियों की सूची तैयार कर रही थीं वहीं डीएमके प्रमुख करुणानिधि ज्यादा मंत्रिपद की चाह में कोपभवन में जाकर बैठ गए । अब कांग्रेस आलाकमान के सामने समस्या ये कि वो अपने इस पुराने सहयोगी को समझाए कैसे । डीएमके को मनाने की कई कोशिशें की गयीं लेकिन वो टस से मस नहीं हुए । और आखिरकार नई सरकार को बिना डीएमके के मंत्रियों के ही शपथ लेनी पड़ी ।
कुल मिलाकर यूपीए सरकार की शुरुआत ही नहीं ठीक रही । वैसे शुरुआत तो कांग्रेस की पिछली सरकार की भी ठीक नहीं थी लेकिन उसने पांच साल कार्यकाल पूरा किया था । पांच साल पहले भी सरकार बनते समय डीएमके ने मंत्रिपद को लेकर ड्रामा किया था । दरअसल डीएमके की इस बार की सत्ता की नौटंकी के पीछे का कारण पारिवारिक है । डीएमके प्रमुख करुणानिधि अपने परिवार के मोह में अंधे हो गए हैं । करुणानिधि के सामने समस्या ये है कि वो अपने बेटे अझागिरी , बेटी कनीमोझी नाती दयानिधि मारन तीनों के लिए ही पद चाहते हैं । यहीं नहीं पार्टी के समीकरण को दुरुस्त रखने के लिए टी आर बालू और ए राजा को भी सत्ता की मलाई दिलाना चाहते हैं । करुणानिधि का यही परिवार मोह उन्हें मुसीबत में डाले हुए हैं ।
अब ये कहां की राजनीति है कि एक ही परिवार के तीन तीन सदस्यों को मंत्री के पद से नवाजा जाए । लेकिन यही तो क्षेत्रीय दलों की राजनीति है । अपने समर्थन के बदले में हर प्रकार की शर्ते मनवा लेना इन क्षेत्रीय दलों की पुरानी आदत रही है । समर्थन के बदले में राज्य के हितों के लिए कुछ शर्तें मनवा लेना तो जायज कहा जा सकता है लेकिन पूरे परिवार को सत्ता में हिस्सेदारी दिलवाना केवल ब्लैकमेलिंग ही कहा जाएगा । वैसे करुणानिधि का परिवारवाद केवल यहीं खत्म नहीं होता है । राज्य की राजनीति में भी करुणानिधि के परिवार का ही बोलबाला है । करुणानिधि के बेटे स्टालिन राज्य में मुख्यमंत्री की कुर्सी के वारिस हैं । कुल मिलाकर करुणानिधि पूरे परिवार को ही सत्ता दिला देना चाहते हैं । लेकिन कांग्रेस भी डीएमके के इस दबाब में नहीं आना चाहती है । कांग्रेस को डीएमके के परिवार से तो समस्या नहीं है लेकिन उसे असली दिक्कत बालू और राजाके नाम को लेकर है । राजा और बालू दोनों ही पिछली सरकार में मंत्री थे । कांग्रेस आलाकमान दोनों ही मंत्रियों की कारगुजारी से वाकिफ है । राजा और बालू दोनों के ही दामन पर भ्रष्टाचार के दाग हैं । कांग्रेस आलाकमान और खासतौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बार अपने मंत्रिमंडल में किसी भी प्रकार का दाग नहीं देखना चाहते हैं । यही वजह है कि कांग्रेस दोनों के नाम पर आनाकानी कर रही है । लेकिन गठबंधन की राजनीति की मजबूरियां आखिरकार कांग्रेस को इन दोनों को मंत्रिमंडल में शामिल करने पर मजबूर कर देगी । अब देखना है कि डीएमके कब तक कांग्रेस के साथ ये ब्लैकमेलिंग का खेल खेलती रहेगी ।
अनवरत तलाश
1 day ago



ताज और ओबेराय होटल के फर्श पर बिखरे खून मानो मेरी आंखों में कई चढ़ आया है। हर ओर खून दिखता है, खौफ़ दिखता है। मुंबई आज पिर चल पड़ी है। उसी खौफ़ के साथ। पूरी मुंबई के चेहरे पर खौफ है। मन बहलाने के लिए कहने वाले कह रहे हैं--मुंबई का जज्बा। मुंबई के जज्बे को सलाम। लोग मन ही मन भन्नाते हैं। ताड़ पर मत चढ़ाओ। कोई जज्बा नहीं है। मजबूरी है। पेट के लिए घर से बाहर निकलना पड़ेगा। निकल रहे हैं। सुरक्षा चाहिए। पुख्ता इंतज़ाम ताकि आम आदमी भेंड़ बकरी की तरह न मारा जाय। सरकार सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम रहती है तो जज्बे को सलाम करती है।

