सुरेश जायसवाललोकसभा चुनावों के नतीजोंने कांग्रेस की तो बल्ले बल्ले कर दी लेकिन कितनों के तो सपने ही तोड़ दिए। चुनाव नतीजों से पहले बहुत से लोगों ने तरह तरह के सपने संजोकर रखे थे लेकिन इन कमबख्त नतीजों ने सारे सपनों पर पानी फेर दिया । नतीजों ने कितनों के सपनों को तो ऐसा तोड़ा कि वो कहीं के नहीं रहें लेकिन कुछ तो फिर से कुर्ता झाड़ कर खडे हो गए हैं ।
टूटे सपनों की इस कड़ी में बात करते हैं सबसे पहले लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी की । चुनाव नतीजों ने सबसे बड़ा झटका किसी को दिया है तो वो हैं पीएम इन वेटिंग आडवाणी । आडवाणी की किस्मत में शायद राजयोग लिखा ही नहीं था , अब उनको शायद पीएम इन वेटिंग से ही संतोष करना पड़ेगा । वैसे तो आडवाणी ने जी बरसों से पीएम बनने का सपना संजो कर रखा था लेकिन कभी वाजपेयी ने तो कभी पार्टी की अंतरकलह से उनके सपनों को साकार नहीं होने दिया और आखिरकार आडवाणी जी पीएम की कुर्सी का वेट करते ही रह गए । आडवाणी की उम्र और मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए तो ऐसा ही लगता है कि अब आने वाले समय में उनका ये सपना पूरा होने से रहा । अब आडवाणी जी अगर अगले लोकसभा चुनावों के लिए तैयारी करें तो बात और है लेकिन ऐसा होना मुश्किल ही लग रहा है । ''मजबूत नेता'' आडवाणी जब तथाकथित ''कमजोर पीएम ''मनमोहन सिंह से मुकाबला नहीं कर सके तो अगले चुनावों में कांग्रेस के संभावित पीएम उम्मीदवार राहुल गांधी का क्या मुकाबला कर सकेंगे । खैर हम आडवाणी के सपने के टूटने पर केवल सहानुभूति ही व्यक्त कर सकते हैं ।
अब बात करते हैं कुछ और लोगों का जिनके सपने चुनाव नतीजों की आंधी में बह गए । सीपीएम महासचिव प्रकाश करात भी उन्हीं लोगों में शामिल हैं जो आज अपने सपने टूटने पर आंसू बहा रहे होंगे । करात ने भी चुनावों से पहले देखा था एक सपना , सपना तीसरे मोर्चे की सरकार का । लेकिन वाह री जनता जनार्दन कैसी बेरहमी से इस सपने को चकनाचूर कर दिया । लेफ्ट पहले तो अपना ही गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल नहीं बचा सका । बची खुची उम्मीदें जयललिता , माया और नायडू के खराब प्रदर्शन ने पूरी कर दी । खैर अब करात साहब का सपना तो पूरा नहीं हो सका लेकिन वो इससे निराश बिल्कुल नहीं है और अगले चुनाव में गैर कांग्रेस ,गैर बीजेपी सरकार की तैयारियों में लग गए हैं ।
अब बात मराठा सरदार शरद पवार के सपने की । शरद पवार वैसे तो इन नतीजों पर खुशी जाहिर कर रहे हैं लेकिन पवार साहब ये पब्लिक है सब जानती है । ये बात तो सबको पता है कि नतीजों ने आपका दिल ऐसा तोड़ा है कि आप अपने आंसू दिखा भी नहीं पा रहे हैं । पवार साहब ने खंडित जनादेश की हालत में पीएम बनने का सपना संजो रखा था । पवार साहब का एक पैर तो यूपीए में था लेकिन दूसरा पैर वो तीसरे मोर्चे के साथ जोड़े हुए थे । पवार ने अपनी तरफ से पीएम बनने की हर गोटी सेट कर रखी थी लेकिन ईवीएम मशीनें खुलीं तो सपने पर जैसे घडों पानी पड़ गया । पवार ने लेफ्ट से लेकर पटनायक तक , जया से लेकर माया तक और नीतीश से लेकर शिवसेना तक से पींगे बढ़ा रखीं था लेकिन सारी मेहनत पर नतीजों ने पानी फेर दिया ।
चुनाव नतीजों ने दो महिलाओं के सपने पर भी पानी फेर दिया । ये दो महिलाएं है मायावती और जयललिता । बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने भी सपना देखा था कि वो बड़ी संख्या में सीटें जीतकर लाएंगी और सत्ता की जोड़तोड़ के जरिए पीएम की कुर्सी हासिल कर लेंगी । लेकिन न तो माया का दलित समाज का नारा काम आया और न ही सर्वसमाज का । दलित पीएम बनने की उनकी हसरत अधूरी ही रह गयी । कुछ ऐसा ही सपना टूटा है अम्मा का । अम्मा यानी एआईएडीएमके नेता जयललिता । जयललिता को तो इस बार तमिलनाडु में क्लीन स्वीप की उम्मीद थी । हर कोई कह रहा था कि अम्मा तो इस बार डीएमके का सूपडा साफ कर देंगी । वैसे भी तमिलनाडु की जनता का ये तरीका रहा है कि वो एक बार एक पार्टी और अगली बार दूसरी पार्टी को सत्ता का स्वाद चखने का मौका देती हैं । लेकिन जनता ने ये भ्रम भी तोड़ दिया और दिल्ली की सत्ता की मलाई चखने का अम्मा का ख्वाब अधूरा ही रह गया ।
ये तो थे वो बड़े बड़े सपने जिन्हें जनता की मार ने तोड़ दिये , इसके अलावा छोटे मोटे सपने तो कितने ही टूट गए जिनकी कोई लिस्ट ही नहीं है । ये तो बातें थी नेताओं के सपने की । चुनावी नतीजों ने मीडिया के सपने को भी चकनाचूर कर दिया है । खासतौर पर टीवी चैनल के लोगों ने तो क्या क्या सपने सजा रखे थे । उम्मीद थी बहुमत तो किसी को मिलगा नहीं और फिर होगी जमकर जोड़तोड़ । इस जोड़तोड में टीवी चैनलों को भी अपनी दूकान चमकने का सपना था । लग रहा था कि करीब पखवाड़े तक तो ये गणित चलेगा ही कि कौन किधर जा रहा है , कौन किससे मिल रहा है ,किसकी सरकार बनेगी वगैरह वगैरह । लेकिन नतीजों ने इसका मौका ही नहीं दिया और दो घंटे के अंदर ही साफ हो गया कि मनमोहन की अगुवाई में यूपीए की ही सरकार बनने जा रही है । खैर सपने तो सपने ही होते है कुछ पूरे होते हैं तो कुछ अधूरे ही रह जाते हैं । हम तो बस ये ही कह सकते हैं कि भैया ये तो जनता है बड़े बड़ों के सपने में आग लगा देती है ।