सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। ऐसे ही आते रहिए, अच्छा लगता है

 

 

Sunday, April 27, 2008

आ कि मिलजुल कर तो बतिया लें हैं जो बातें बचीं

नूर मुहम्मद नूर की एक ग़ज़ल

कितने उजले दिन बचे, कितनी हसीं राते बचीं
जाने कितनी और लफ़्जों से मुलाक़ातें बचीं
फिक्रोफन शेरोसुखन से भीग जाना सुबहोशाम
जानें कितनी और इस मौसम की बरसातें बचीं
कब ज़ुबां खामोश आंखें बंद हो जाएं कि आ
आ कि मिलजुल कर तो बतिया लें हैं जो बातें बचीं
बदकलामी नफरतें और पैंतरे चालाकियां
क्या यही अब लेने देने को हैं सौगातें बचीं
हर कोई यह जानता है क्यों उजाले हैं उदास
इन अंधेरों की अभी भी नूर जो घातें बचीं।

Wednesday, April 23, 2008

योजनाओं को लगी आने जम्हाई हाय हाय.

नूर मुहम्मद नूर की एक ग़ज़ल


जो बंधी थी गांठ में वो भी गंवाई हाय हाय
आपकी बंदानवाज़ी रहनुमाई हाय हाय


कब से फैलाए खड़े हैं हाथ अपने राह में
थामते हैं आप गै़रों की कलाई हाय हाय

फिर वही कौरव वही पांडव महाभारत वही
छिड़ रही है फिर उसी जैसी लड़ाई हाय हाय


हम कि दोनों जून की रोटी को भी महंगे हुए
चाभते हैं आप लंदन की मलाई हाय हाय


अब कोई क़ातिल कोई मुजरिम न बख्शा जाएगा
आपने क्या खूब फ़रमाया, बधाई हाय हाय


काग़ज़ों पे पुल बने, सड़कें बनीं फिर क्या हुआ
योजनाओं को लगी आने जम्हाई हाय हाय.

Sunday, April 20, 2008

हम उसके दुपट्टे को रफू करते रहे

नूर मुहम्मद नूर की एक ग़ज़ल

भूख जब वे गांव की पूरे वतन तक ले गए
मामला हम भी ये फिर शेरोसुखन तक ले गए

हम इधर उसके दुपट्टे को रफू करते रहे
वो उधर शेरों को उसके तन बदन तक ले गए

आग भी हैरान थी शायद ये मंजर देखकर
जब उसे तहज़ीबदां घर की दुल्हन तक ले गए

हम पिलाते रह गए अपना लहू हर लफ़्ज को
और वे बेअदबियां सत्तासदन तक ले गए

छेनिया, बंसुला, अंगूठे उंगलियां ख्वाबोख्याल
हम ही तहजीबों को उनके बांकपन तक ले गए

जबकि हर तोहमत सहा, भूखे रहे ए नूर हम
फिर भी अपनी प्यास हम गंगोजमन तक ले गए।

Saturday, April 19, 2008

बोए जाते हैं बेटे, उग आती हैं बेटियां

नाम खुशी है लेकिन ग़म के समंदर में सराबोर। उम्र इतनी नहीं कि समझ पाए कि क्या होता है ग़म। इसलिए आज वो खुश है। पेट भर जाता है तो खिलखिला उठती है मासूम सी खुशी। समझ नहीं पाती कि मम्मी पास नहीं क्योंकि वो इतनी प्यारी है कि कई हाथ उसे लपकने के लिए बेताब रहते हैं। पापा का प्यार नहीं जानती। चार महीने की ये मासूम बच्ची मुंबई के सियॉन अस्पताल में है। उसके मां-बाप उसे छोड़कर भाग गए हैं क्योंकि वो लड़की है।
दिसंबर 2007 में शीला जायसवाल नाम की महिला ने इस अस्पताल में एक बच्ची को जन्म दिया। जब शीला और उसके पति को पता चला कि उन्हें बेटी हुई है तो पहले उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें बेटा हुआ था लेकिन अस्पताल वालों ने बच्चा बदल दिया। जब डीएनए रिपोर्ट से ये साबित हो गया कि खुशी उन्हीं की बेटी है तो उन्होंने उसे ले जाने से इनकार कर दिया और पल्ला बचाने कि लिए अस्पताल से ही फरार हो गए। फिलहाल अस्पताल ही बच्ची का घर बना हुआ है। वहां के नर्सों से प्यार दुलार मिल रहा है।
समझ में नहीं आता कि क्या मां-बाप इतने निष्ठुर हो सकते हैं। अपने कलेजे के टुकड़े को सिर्फ इसलिए छोड़ कर भाग गए क्योंकि वो लड़की है। मुंबई जैसे महानगर में ही ऐसे निष्ठुर नजारे देखने को मिल सकते हैं। इससे तो लाख गुना बेहतर अपने गांव-गिरांव हैं, जहां कम से कम लड़कियों को कोई फेंक कर नहीं भाग जाता। वहां किसान भले ही गरीबी की अंतहीन लड़ाई लड़ रहे हों, दो अक्षर पढ़ लिख लेने के लिए ताउम्र जद्दोजहद कर रहे हों लेकिन शायद बेटी के साथ ऐसी निष्ठुरता वो भी नहीं करते। बेटी को मान दीजिए, बेटी आपको सम्मान की उस बुलंदी तक पहुंचा सकती है, जिसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते।
किसे दोष दें-शीला को, उसके पति को या सामाजिक व्यवस्था को? अगर शीला और उसके पति की माली हालत इतनी ही खराब थी कि बच्ची को नहीं पाल सकते तो बेटे की चाहत क्यों? अगर बेटे को पाल सकते हैं तो बेटी को क्यों नहीं? अगर बच्चे पालने की क्षमता नहीं थी तो फिर परिवार नियोजन के तो पचास तरीके उपलब्ध हैं। मुझे लगता है कि ममता के आगे सारी मुश्किलें छोटी हैं। जानवर भी अपने बच्चे को सीने से लगाकर पाल लेते हैं। शीला ऐसा क्यों नहीं कर सकी? इस सवाल का जवाब जितना शीला और उसके पति को ढूंढना है, उतना ही हम सब को भी ताकि बेटियों के साथ कोई ऐसा सलूक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
हर साल नवरात्र के आखिरी दिन नौ बच्चियों को जुटाने के लिए लोगों को पसीने बहाते देखा है मैंने। पूरी कॉलोनी में नौ बच्चियां नहीं मिल पाती। ये चिंता केवल नवरात्र के आखिरी दिन ही हमें क्यों सताती है? हम अगले साल के लिए फिर क्यों नहीं सोचते? क्यों नहीं बच्चियों को बचाने की मुहिम शुरू कर देते? जिस बेटी को पूजने का प्रावधान है, उसके साथ ऐसा सलूक?
बेटियों को बोझ समझने वालों के लिए एक कवि की कुछ पंक्तियों के साथ आपसे एक सवाल कि क्या बेटियां सचमुच इतनी बुरी होती हैं-(बहुत शर्मिन्दा हूं कि कवि का नाम याद नहीं आ रहा है)--
बोए जाते हैं बेटे, उग आती हैं बेटियां
खादी पानी बेटों में, लहलहाती हैं बेटियां
एवरेस्ट पर ठेले जाते हैं बेटे
पर चढ़ जाती हैं बेटियां
रूलाते हैं बेटे और रोती हैं बेटियां
कई तरह से गिराते हैं बेटे
पर संभाल लेती हैं बेटियां

Friday, April 18, 2008

सिंहराज की निद्रा में खलल मत डालो

सुरेंद्र दीप की दो कविताएं

हिंदी कविता में सुरेंद्र दीप ने तेज़ी से अपनी ज़गह बनाई है। उन्हीं के शब्दों में कहे तो, "समाज में अपने को और अपने में समाज को खोजने की प्रक्रिया मेरी कविता का विवेक है।" सुरेंद्र की कविताएं अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। यहां उनकी जो दो कविताएं दी जा रही हैं, वो उनके कविता संग्रह ऐसा नहीं हो सकता में संकलित हैं।
कुत्ते का जवाब

एक दिन मैंने
एक रईस कुत्ते को टटोला
बड़ी विनम्रता से उससे बोला
भाई कुत्ते!
एक मुश्किल काम करोगे
आदमी की मौत मरोगे?

वह आंखें तरेरे गुर्राया
भौंक कर मुझे दौड़ाया
गरजते हुए फिर बोला
वह ज़माना लद गया
जब हम चाहते थे
इंसानी मौत मरना!

अब तो हम कारों से चलते हैं
ऐशो-आराम से पलते हैं
मरघट भी शान से जाते हैं
हमारे श्राद्ध में हज़ारों लोग खाते हैं
और तुम!
कोई जिंदगी है जो जीते हो
हमारी मौत को तरसते हो
फुटपाथ पर रहते हो
मरने पर भी कोई नहीं पूछता
कहीं नाले में पड़े सड़ते हो
म्युनिसिपलिटी वाले ही आकर उठाते हैं
दफनाते या जलाते हैं
तुम्हारे हमशक्ल भी
तुम्हें अछूत समझते हैं
तुम तो दो कौड़ी में बिकते हो
अपने को बड़े शहंशाह समझते हो?
जाओ, जाओ
पहले अपनी बिरादरी का ख्याल करना
फिर आकर मुझसे सवाल करना।
छूछी कविताएं

जब जंगल जल रहा होता है
क्रोध से, भय से, अपमान से
जब पौधे छटपटा रहे होते हैं
प्यार से, भूख से, आतंक से
जब टहनियां चिल्ला रही होती हैं
चीरहरण से, प्यासी आंखों से, ललचाई जिह्वा से
तब लोकतंत्र मुंह पर अंगुली रखकर
इशारा करता है--चुप...चुप...चुप...
सिंहराज की निद्रा में खलल मत डालो
ऐसे खतरनाक समय के प्रतिवाद में
उठ खड़े होने की जगह
लगते हैं हम परोसने
सूखे पत्तों पर अपनी-अपनी बासी और छूंछी कविताएं।

Thursday, April 17, 2008

पर जाना तो होगा ही

शैलेंद्र की दो कविताएं

शैलेंद्र की कविताएं पढ़ते वक्त आप अपने आसपास की बहुत सारी संवेदनाओं को महसूस कर सकेंगे। शैलेंद्र की कविताएं शहरी संवेदनाओं की कविताएं हैं तो गांव की ज़मीन को भी जकड़े रहती है। पेशे से पत्रकार शैलेंद्र जनसत्ता के कोलकाता संस्करण के प्रभारी हैं। अब तक उनके तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं--जनपथ, मैं हूं तुम्हारी कविता और अपने ही देश में। यहां दी गई कविताएं उनके संग्रह अपने ही देश में संकलित हैं।
प्रारब्ध
संगोष्ठी में
सभी वक्ताओं ने
दीर्घायु होने की कामना की
और रचते रहने का किया आग्रह भी
ऐसे ही क्षणों में
एक बूढ़े के कान में
एक बूढ़े होते कवि ने
धीरे से कहा-
'पर जाना तो होगा ही'
बुजुर्गवार की मुस्कराहट में
हंसती हुई उदासी बिखर गई-
'यही तो सच है'
इसी सच को
ताउम्र
झुठलाते की कोशिश में
जुटे रहते हैं
शायद हम सभी।
सच के बारे में
आओ
थोड़ा छत पर टहल लें
मकान मालिक के
लौटने तक
चांदनी तले
थोड़ा हंस-खिलखिला लें
तारों की ओर नज़र कर लें।
कितना अच्छा लगता है
तुम्हारे हाथ में हाथ डालकर
थिरकना खुले आसमान के नीचे।

अभी पड़ोस की इमारतें
ऊंचा उठने ही वाली हैं
और उस तरफ़
बस रही बस्ती
उफ!
हर तरफ उठ रही हैं लाठियां
कमजोर जिस्मों को तलाशती
आओ
थोड़ा और करीब आओ
कदम-कदम पर हारते
सच के बारे में
थोड़ा बतिया लें।

दुनिया का सबसे मुश्किल काम

दुनिया में सबसे कठिन काम क्या है? सबसे मुश्किल? जवाब है --क्षमा कर देना। गुस्से में बिफरना आसान है, खून के बदले खून का नारा देना आसान है लेकिन खून के बदले माफ़ी--ये कठिन है। ऐसा वही कर सकता है, जिसका दिल न केवल बड़ा हो बल्कि जो परिपक्व और समझदार भी हो। प्रियंका गांधी (वढरा) ने ऐसी ही एक मिसाल पेश की है। अपने पिता राजीव गांधी की क़ातिल नलिनी से जेल में मिलने जाना महज एक इत्तिफाक नहीं हो सकता। इस फैसले पर पहुंचने से पहले काफी लंबा आत्ममंथन चला होगा और तब प्रियंका के कदम उठ गए होंगे वेल्लोर जेल की तरफ।
एक घंटे की मुलाक़ात। आंखों में आंसू। दया और क्षमा का अजस्र प्रवाह। जो नलिनी राजीव गांधी की हत्या करने वाली टीम में शामिल थी, उसका कहना है कि उसके पाप धूल गए। अद्भुत। बदले की आग और खून की भाषा बोलने वाली नलिनी का ये परिवर्तन ही बताता है कि क्षमा कितना प्रभावशाली होता है। उसमें कितनी ताकत होती है। इस मुलाक़ात के बाद प्रियंका ने कहा कि उसने नलिनी से मिलने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उन्हें नफ़रत और क्रोध पसंद नहीं।
ये पूरा प्रकरण इसलिए भी प्रभावित करता है क्योंकि इसमें कोई राजनीतिक ढोंग नहीं है। चुनावी फायदा उठाने की जुगत नहीं है। मन से की गई पहल है। इस तरह का एक बड़ा दिलेर कदम किस तरह किसी की जिंदगी बदल सकता है, ये नलिनी के अनुभवों से समझा जा सकता है। सचमुच प्रियंका ने अपने नाम के साथ जुड़े गांधी टाइटल को चरितार्थ कर दिया। क्षमा करने की ये ताक़त 'गांधी' से ही मिल सकती है।

Wednesday, April 16, 2008

ऐब हम में देख पर बंधु! वफ़ादारी भी देख

नूर मुहम्मद नूर की एक ग़ज़ल

हक़ तुझे बेशक़ है, शक से देख, पर यारी भी देख
ऐब हम में देख पर बंधु! वफ़ादारी भी देख
आज भी हम बेग़ज़ा, बेइल्म अपने मुल्क में
फिर भी हम जिंदा यहीं हैं, ये तरफ़दारी भी देख
सरफ़रोशी की, लुटाया जिस्मोजां, इल्मोफुनून
और बदले में ख़रीदा क्या, ख़रीदारी भी देख
लड़ रहे हैं और हम लड़ते रहेंगे तीरगी
नूर के हिस्से का ये चकमक जिगरदारी भी देख

Tuesday, April 15, 2008

एक मौत, जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया

रामजतन मर गया। अपनी मौत नहीं मरा वो। उसकी मौत को बेमौत मरना भी नहीं कहेंगे। सरकारी मौत मर गया वो। उसके मन में कहीं न कहीं बसे हुए इस विश्वास ने उसकी जान ले ली कि सरकार उसकी मदद करेगी। अधिकारी उसकी बात सुनेंगे।
रामजतन उस बीमार शख्स का नाम है, जिसने गया में डीएम के दफ्तर के सामने भूख से दम तोड़ दिया। वो पिछले एक हफ्ते से अनशन पर था। अनशन खत्म हो गया। वो भी खत्म हो गया। अब उसे कभी भोजन की जरूरत नहीं पड़ेगी। दवा की जरूरत नहीं पड़ेगी। जो काम बीमारी नहीं कर सकी, वो काम उसकी जिद, विश्वास और सरकारी अमले की लापरवाही ने कर दिखाया।
रामजतन बीमार था। इलाज के लिए पैसे नहीं था। वो चाहता था कि सरकारी पैसे पर उसका इलाज हो जाय। 6 महीने से इसके लिए कोशिश कर रहा था। अर्जी पर अर्जी दिए जा रहा था। सरकार पर अपना हक समझ इस मांग को लेकर वो बहुत ही इमोशनल हो गया। इतना इमोशनल कि अनशन पर बैठ गया, जिसने आखिरकार उसकी जान ले ली।
दवा के लिए किसी ने पैसे नहीं दी लेकिन कफ़न के लिए प्रशासन ने 1500 रुपए जरूर दे दिए।

Monday, April 14, 2008

क्या आग भी नहीं है, ज़रा सी ज़ुबान में

नूर मुहम्मद नूर की एक ग़ज़ल

बेमुल्क हो रहा है जो हिन्दोस्तान में
हर पल समा रहा है मेरे ज़ेहनोजान में

औंधा पड़ा हुआ है हर इक मोर्चे पे मुल्क
पर झंडे उड़ रहे हैं ग़ज़ब आसमान में

भाषा तो खैर आपकी दुमदार हो गई
क्या आग भी नहीं है, ज़रा सी ज़ुबान में

यह कौन पूछता है उधर खांसता हुआ
है और कितनी देर अभी भी बिहान में

कुछ इस तरह से लोग दिलेरहनुमा में हैं
जूं जिंदगी भरी हो किसी नाबदान में

फिरता था जिसके पीछे ज़माना वो आज तक
वहीं तन्हा पड़ा हुआ है अंधेरे मकान में

गिरते हो बार-बार अंधेरे में नूर तुम
अब भी कहीं कमी है तुम्हारी उड़ान में।